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Friday, September 18, 2015

Nal - Damyanti ( नल दमयंती )

निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा थे। बहुत सुन्दर और गुणवान थे। वे सभी तरह की अस्त्र विद्या में भी बहुत निपुण थे। उन्हें जूआ खेलने का भी थोड़ा शोक था। उन्हीं दिनों विदभग् देश में भीमक नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न थे। उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतान प्राप्त की थी- तीन पुत्र और एक कन्या । पुत्रों के नाम थे दम,दान्त व दमन पुत्री का नाम था दमयन्ती। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवन्ती थी। बड़ी-बड़ी आंखे थी। उस समय देवताओं और यक्षों मे कोई भी कन्या इतनी रूपवती नहीं थी।

उन दिनों कितने ही लोग उस देश में आते और राजा नल से दमयन्ती के गुणों का बखान करते। एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंसे को पकड़ लिया। हंस ने कहा आप मुझे छोड़ दीजिए तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको जरूर वर लेगी।

वे सब हंस उड़कर राजकुमारी दमयन्ती के पास गए। दमयन्ती उन्हें देखकर बहुत खुश हुई। हंसों को पकडऩे के लिए दौडऩे लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़कर दौड़ती। वही हंस बोल उठता- रानी दमयन्ती निषध देश का एक नल नाम का राजा है। वह राजा बहुत सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुंदर और कोई नहीं है। वह मानो साक्षात कामदेव का स्वरूप है। यदि तुम उसकी पत्नी बन जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जाए।

वह अश्विनी कुमार के समानसुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुंदर और कोई नहीं है। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों को भूषण है। तुम दोनों की जोड़ी बहुत सुंदर है। दमयन्ती ने कहा- हंस तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना। हंस ने लौटकर राजा नल को उनका संदेश दिया। दमयन्ती हंस के मुंह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी।

उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह रात दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वे कमजोर सी दिखने लगी। सहेलियों ने दमयन्ती के मन के भाव जानकर राजा से निवेदन किया कि आपकी पुत्री अस्वस्थ्य हो गई हैं। राजा ने बहुत विचार किया और अंत में इस निर्णय पर पहुंचा कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गई है।

दमयन्ती के पिता ने सभी देशों के राजा को स्वयंवर के लिए निमंत्रण पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया। सभी देश के राजा हाथी व घोड़ों के रथों से वहां पहुंचने लगे। नारद और पर्वत से सभी देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया। इन्द्र और सभी लोकपाल भी अपने वाहनों सहित रवाना हुए। राजा नल को भी संदेश मिला तो वे भी दमयन्ती से स्वयंवर के लिए वहां पहुंचे। नल के रूप को देखकर इंद्र ने रास्ते में अपने विमान को खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर कहा कि राजा नल आप बहुत सत्यव्रती हैं।

आप हम लोगों के दूत बन जाइए। नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि करूंगा। फिर पूछा कि आप कौन है तो इन्द्र ने कहा हम लोग देवता है। हम लोग दमयन्ती के लिए यहां आएं हैं। आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइए और कहिए कि इन्द्र, वरुण, अग्रि और यमदेवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहो उस देवता को अपना पति स्वीकार कर लो।

नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि देवराज वहां आप लोगों का और मेरे जाने का एक ही प्रायोजन है। इसलिए आप मुझे वहां दूत बनाकर भेजे यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो वह भला उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है? आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा कीजिए। देवताओं ने कहा नल तुम पहले हम लोगों से प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं तुम्हारा काम करूंगा। अब प्रतिज्ञा मत तोड़ो। अविलम्ब वहां चले जाओ। नल ने कहा- राजमहल में निरंतर कड़ा पहरा रहता है मैं कैसे जा सकुंगा।

राजकुमारी दमयन्ती ने कही अपने दिल की बात

इन्द्र की आज्ञा से नल ने राजमहल में बिना रोक टोक के प्रवेश किया। दमयन्ती और उसकी सहेलियां भी उसे देखकर मुग्ध हो गयी और लज्जित होकर कुछ बोल न सकी। तुम देखने में बड़े सुंदर और निर्दोष जान पड़ते हो। पहले यहां आते समय द्वारपालों ने तुम्हे देखा क्यों नहीं? उनसे तनिक भी चूक हो जाने पर मेरे पिता बहुत कड़ा दण्ड देते हैं। नल ने कहा- मैं नल हूं। लोकपालों का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूं।

सुन्दरी ये देवता तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक देवता के साथ विवाह कर लो। यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूं। उन देवताओं के प्रभाव से जब मैंने तुम्हारे महल में प्रवेश किया तो मुझे कोई देख नहीं पाया। मैंने तुमसे देवताओं का संदेश कह दिया है अब जो कहना है कह दो। अब तुम्हारी जो इच्छा हो करो।

दमयन्ती ने बड़ी श्रृद्धा के साथ देवताओं को प्रणाम करके मन्द मुस्कान के साथ कहा स्वामी मैं तो आपको ही अपना सर्वस्व मानकर अपने आप को आपके चरणों में सौंपना चाहती हूं। जिस दिन से मैंने हंसों की बात सुनी तभी से मैं आपके लिए व्याकुल हूं। आपके लिए ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है। यदि आप मुझ दासी की प्रार्थना अस्वीकार कर देंगे तो मैं जहर खाकर मर जाऊंगी।

दमयन्ती की खुशी का ठिकाना ना रहा जब  राजा नल ने दमयन्ती से कहा- जब बड़े-बड़े लोकपाल तुमसे शादी करना चाहते हैं फिर तुम मुझ मनुष्य से क्यों शादी करना चाहती हो। मैं तो उन देवताओं के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं हूं। तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं का अप्रिय करने पर इंसान की मृत्यु हो सकती है। तुम मेरी रक्षा करो और उनको वरण कर लो। नल की बात सुनकर दमयन्ती घबरा गई। उसकी आंखों में आंसु छलक आए। उस समय दमयन्ती का शरीर कांप रहा था हाथ जुड़े हुए थे। उसने कहा मैं आपको वचन देती हूं कि मैं आपको ही पति के रूप में वरण करूंगी।

राजा नल ने कहा-अच्छा तब तो तुम ऐसा ही करो परंतु यह बतलाओ कि मैं यहां उनका दूत बनकर आया हूं। अगर इस समय मैं अपने स्वार्थ की बात करने लगूं तो यह कितनी बुरी बात है। मैं तो अपना स्वार्थ तभी बना सकता हूं जब वह धर्म के विरूद्ध ना हो। तब दमयन्ती ने गदगद कण्ठ से कहा राजा इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। उसके अनुसार काम करने पर आपको दोष नहीं लगेगा।

वह यह उपाय है कि आप सभी लोकपालों के साथ स्वयंवर मंडप में आए। मैं आपको वर लुंगी। तब आपको दोष भी नहीं लगेगा। देवताओं के पूछने पर उन्होंने कहा मैं दमयन्ती के पास गया तो मुझे देखकर वे और उनकी सखियां सभी मुझ पर मोहित हो गई और आप लोगों के प्रस्ताव को उनके सामने रखने के बाद भी वे मुझे ही वरण करने पर तुली हैं।

दमयन्ती ने कैसे पहचाना असली राजा नल को?

स्वयंवर की घड़ी आई। राजा भीमक ने सभी को बुलवाया। शुभ मुहूर्त में स्वयंवर रखा। सब राजा अपने-अपने निवास स्थान से आकर स्वयंवर में यथास्थान बैठ गए। तभी दमयन्ती वहां आई। सभी राजाओं का परिचय दिया जाने लगा। दमयन्ती एक-एक को देखकर आगे बढऩे दिया जाने लगा। आगे एक ही स्थान पर नल के समान ही वेषभुषा वाले पांच राजकुमार खड़े दिखाई दिए। यह देखकर दमयन्ती को संदेह हो गया, वह जिसकी और देखती उन्हें सिर्फ राजा नल ही दिखाई देते। इसलिए विचार करने लगी कि मैं देवताओं को कैसे पहचानूं और ये राजा है यह कैसे जानूं? उसे बड़ा दुख हुआ। अन्त में दमयन्ती ने यही निश्चय किया कि देवताओं की शरण में जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी। देवताओं हंसों के मुंह से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूपण से वरण कर लिया है।

मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत शुरू कर लिया है। आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे में राजा नल को पहचान लूं। देवताओं ने दमयन्ती की बात सुनकर उसके दृढ़-निश्चय को देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दी जिससे वह देवता और मनुष्य में अंतर कर सके। दमयन्ती ने देखा कि शरीर पर पसीना नहीं है। पलके गिरती नहीं हैं। माला कुम्हलाई नहीं है। शरीर स्थिर है। शरीर पर धूल व पसीना भी नहीं है। दमयन्ती ने इन लक्षणों को देखकर ही दमयन्ती ने राजा नल को पहचान लिया।

कलयुग ने किया नल के शरीर में प्रवेश

जिस समय दमयंती के स्वयंवर से लौटकर इन्द्र व अन्य लोकपाल अपने-अपने लोकों को जा रहे थे। उस समय उनकी मार्ग में ही कलयुग और द्वापर से भेंट हो गई। इन्द्र ने पूछा कलयुग कहा जा रहे हो? कलियुग ने कहा-मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह करने के लिए जा रहा हूं। इन्द्र ने कहा अरे स्वयंवर तो कब का पूरा हो गया। दमयन्ती ने राजा नल का वरण कर लिया है।

हम लोग देखते ही रह गए। कलयुग ने क्रोध में भरकर कहा - तब तो यह अनर्थ हो गया। उसने देवताओं की उपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया, इसलिए उसको दण्ड देना चाहिए। देवताओं ने कहा- दमयन्ती ने हमारी आज्ञा प्राप्त करके ही नल को वरण किया है। वास्तव में नल सर्वगुण सम्पन्न और उसके योग्य है। वे समस्त धर्मों के जानकार हैं।

उन्होंने इतिहास पुराणों सहित वेदों का भी अध्ययन किया है। उनको शाप देना तो नरक में धधकती आग में गिरने के समान है। अब कलयुग ने द्वापर से कहा मैं अपने क्रोध को शान्त नहीं कर सकता। इसलिए मैं नल के शरीर में निवास करूंगा। मैं उसे राज्यच्युत कर दूंगा। तब वह दमयन्ती के साथ नहीं रह सकेगा। इसलिए तुम भी जूए के पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करना।

द्वापर ने उसकी बात स्वीकार ली। द्वापर और कलयुग दोनों ही नल की राजधानी में आ बसे। बारह वर्ष तक वे इस बात की प्रतीक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दिख जाए। एक दिन राजा नल संध्या के समय लघुशंका से निवृत होकर पैर धोए बिना ही आचमन करके संध्यावंदन करने बैठ गए। यह अपवित्र अवस्था देखकर कलियुग उनके शरीर में प्रवेश कर गया।

जूए में राजा नल सबकुछ हार गए 

कलयुग दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर बनकर उसकी बात स्वीकार करके वह पुष्कर के पास गया और बोला तुम नल के साथ जुआं खेलो मेरी सहायता करो। जूए में जीतकर निषध राज का राज्य प्राप्त कर लो। पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नल के के पास गया। द्वापर भी पासे का रूप धारण करके उसके साथ चला। जब पुष्कर ने राजा नल को जूआ खेलने का आग्रह किया। तब राजा नल दमयन्ती के सामने अपने भाई की बार - बार की ललकार सह ना सके। उन्होंने पासे खेलने का निश्चय किया।

उस समय नल के शरीर में कलयुग घुसा हुआ था, इसीलिए नल जो कुछ भी जूए में लगाते हार जाते। प्रजा और मंत्रियों ने राजा को रोकना चाहा लेकिन जब वे नहीं माने तो मंत्रियों ने द्वारपाल को रानी दमयंती तक राजा को रोकने का संदेश पहुंचवाया। तब रानी नल दमयन्ती को बोली आपकी पूरी प्रजा आपके दुख के कारण अचेत हुई जा रही है। इतना कहकर दमयंती भी रोने लगी। लेकिन राजा नल कलयुग के प्रभाव में थे।

इसीलिए जो पासे फेंकते वही उनके प्रतिकुल पड़ते। जब दमयंती ने यह सब देखा तो उसने धाय को बुलवाया और उसके द्वारा राजा नल के सारथि वाष्र्णेय को बुलवाया। उन्होंने ने उससे कहा सारथि तुम जानते हो कि महाराज बहुत संकट में है। अब यह बात तुम से छिपी नहीं है। तुम रथ जोड़ लो और मेरे बच्चों को रथ में बैठाकर कुंडिनगर ले जाओ। उसके बाद पुष्कर ने राजा नल का सारा धन ले लिया और बोला तुम्हारे पास दावं पर लगाने के लिए और कुछ है या नहीं। यदि तुम दमयंती को दावं पर लगाने के लायक समझो तो उसे लगा दो।

क्योंकि पत्नी का यही धर्म है

एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत से पक्षी उनके पास ही बैठे है। उनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं। नल ने सोचा कि इनकी पांख से कुछ धन मिलेगा। ऐसा सोचकर उन्हें पकडऩे के लिए नल ने उन पर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया। पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गए। अब नल नंगे होकर बड़ी दीनता के साथ मुंह नीचे करके खड़ा हो गए।

पक्षियों ने कहा तु नगर से एक वस्त्र पहनकर निकला था। उसे देखकर हमें बड़ा दुख हुआ था ले अब हम तेरे शरीर का वस्त्र लिए जा रहे है। हम पक्षी नहीं जूए के पासे हैं। नल ने दमयन्ती से पासे की बात कह दी। तुम देख रही हो, यहां बहुत से रास्ते है। एक अवन्ती की ओर जाता है। दूसरा पर्वत होकर दक्षिण देश को। सामने विन्ध्याचल पर्वत है। यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है। सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता है। यह कौसल देश का मार्ग है।

इस प्रकार राजा नल दुख और शोक से भरकर बड़ी ही सावधानी के साथ दमयन्ती को भिन्न-भिन्न आश्रम मार्ग बताने लगे। दमयन्ती की आंखें आंसु से भर गई। दमयन्ती ने राजा नल से कहा क्या आपको लगता है कि मैं आपको छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूं। मैं आपके साथ रहकर आपके दुख को दूर करूंगी। दुख के अवसरो पर पत्नी पुरुष के लिए औषधी के समान है। वह धैर्य देकर पति के दुख को कम करती है।

राजा नल ने क्यों किया दमयंती को छोडऩे का फैसला?

उस समय नल के शरीर पर वस्त्र नहीं था। धरती पर बिछाने के लिए एक चटाई भी नहीं थी। शरीर पर धूल से लथपथ हो रहा था। भूख-प्यास से परेशान राजा नल जमीन पर ही सो गए। दमयन्ती भी उनके साथ ये सारे दुख झेल रही थी। राजा नल भी जमीन पर ही सो गए। दमयन्ती के सो जाने पर राजा नल की नींद टूटी। सच्ची बात तो यह थी कि वे दुख और शोक की के कारण सुख की नींद सो भी नहीं सकते थे। वे सोचने लगे कि दमयंती मुझ से बड़ा प्रेम करती है। प्रेम के कारण ही उसे इतना दुख झेलना पड़ेगा। यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊं तो संभव है कि इसे सुख भी मिल जाए। अन्त में राजा नल ने यही निश्चय कि इसे सुख भी मिल जाए।

दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है। इसके सतीत्व को कोई भंग नहीं कर सकता। इस प्रकार त्यागने का निश्चय करके और सतीत्व की ओर से निश्चिन्त होकर राजा नल ने यह विचार किया कि मैं नंगा हूं और दमयन्ती के शरीर पर भी केवल एक वस्त्र है। फिर भी इसके वस्त्रों में से आधा फाड़ लेना ही श्रेयस्कर है लेकिन फांडू़ कैसे? शायद यह जाग जाए? राजा नल ने यह सोचकर दमयंती को धीरे से उठाकर उसके शरीर का आधा वस्त्र फाड़कर शरीर ढक लिया। दमयंती नींद में थी। राजा नल उसे छोड़कर निकल पड़े। थोड़ी देर बाद वे शांत हुए और वे फिर धर्मशाला लौट आए।

मगर ने रानी को निगलने के लिए जकड़ लिया

थोड़ी देर बाद जब राजा नल का हृदय शांत हुआ ,तब वे फिर धर्मशाला में इधर-उधर घूमने लगे और सोचने लगे कि अब तक दमयन्ती परदे में रहती थी, इसे कोई छू भी नहीं सकता था। आज यह अनाथ के समान आधा वस्त्र पहने धूल में सो रही है। यह मेरे बिना दुखी होकर वन में कैसे रहेगी? मैं तुम्हे छोड़कर जा रहा हूं सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें। उस समय राजा नल का दिल दुख के मारे टुकड़े- टुकड़े हुआ जा रहा था।

शरीर में कलियुग का प्रवेश होने के कारण उनकी बुद्धि नष्ट हो गई थी। इसीलिए वे अपनी पत्नी को वन में अकेली छोड़कर वहां से चले गए। जब दमयंती की नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहां नहीं है। यह देखकर वे चौंक गई और राजा नल को पुकारने लगी।

जब दमयंती को राजा नल बहुत देर तक नहीं दिखाई पड़ें तो वे विलाप करने लगी। वे भटकती हुई जंगल के बीच जा पहुंची। वहां अजगर दमयंती को निगलने लगा। दमयंती मदद के लिए चिल्लाने लगी तो एक व्याध के कान में पड़ी। वह उधर ही घूम रहा था। वह वहां दौड़कर आया और यह देखकर दमयंती को मगर निगल रहा है। अपने तेज शस्त्र से उसने मगर का मुंह चीर डाला। उसने दमयन्ती को छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन करवाया।

दमयन्ती ने क्यों दिया मुसीबत से बचाने वाले को ही शाप?

दमयन्ती जब कुछ शांत हुई। व्याध ने पूछा सुन्दरी तुम कौन हो? किस कष्ट में पड़कर किस उद्देश्य से तुम यहां आई हो? दमयन्ती की सुन्दरता, बोल-चाल और मनोहरता देखकर व्याध मोहित हो गया। वह दमयंती से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपने बस में करने की कोशिश करने लगा। दमयन्ती उसके मन के भाव समझ गई। दमयंती ने उसके बलात्कार करने की चेष्टा को बहुत रोकना चाहा लेकिन जब वह किसी प्रकार नहीं माना तो उसने शाप दे दिया कि मैंने राजा नल के अलावा किसी और का चिंतन कभी नहीं किया हो तो यह व्याध मरकर गिर पड़े। दमयंती के इतना कहते ही व्याध के प्राण पखेरू उड़ गए। व्याध के मर जाने के बाद दमयंती एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुंची।

राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढऩे लगी। तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती ने देखा कि सामने ही एक बहुत सुन्दर तपोवन है। जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं। उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने दमयन्ती का सत्कार किया और उसे बैठने को कहा- दमयन्ती ने एक भद्र स्त्री के समान सभी के हालचाल पूछे।

फिर ऋषियों ने पूछा आप कौन है तब दमयंती ने अपना पूरा परिचय दिया और अपनी सारी कहानी ऋषियों को सुनाई। तब सारे तपस्वी उसे आर्शीवाद देते हैं कि थोड़े ही समय में निषध के राजा को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। उसके शत्रु भयभीत होंगे व मित्र प्रसन्न होंगे और कुटुंबी आनंदित होंगे। इतना कहकर सभी ऋषि अंर्तध्यान हो गए।

दमयन्ती ने मुश्किल समय में भी रख दी शर्त 

दमयंती रोती हुई एक अशोक के वृक्ष के पास पहुंचकर बोली तू मेरा शोक मिटा दे। शोक रहित अशोक तू मेरा शोक मिटा दे। क्या कहीं तूने राजा नल को शोक रहित देखा है। तू अपने शोकनाशक नाम को सार्थक कर।दमयन्ती ने अशोक की परिक्रमा की और वह आगे बढ़ी। उसके बाद आगे बड़ी तो बहुत दूर निकल गई। वहां उसने देखा कि हाथी घोड़ों और रथों के साथ व्यापारियों का एक झुंड आगे बढ़ रहा है। व्यापारियों के प्रधान से बातचीत करके दमयंती को जब यह पता चला कि वे सभी चेदीदेश जा रहे हैं तो वह भी उनके साथ हो गई। कई दिनों तक चलने के बाद वे व्यापारी एक भयंकर वन में पहुंचे। वहा एक बहुत सुंदर सरोवर था। लंबी यात्रा के कारण वे लोग थक चुके थे। इसलिए उन लोगों ने वहीं पड़ाव डाल दिया। रात के समय जंगली हाथियों का झुंड आया। आवाज सुनकर दमयंती की नींद टूट गई। वह इस मांसाहार के दृश्य को देखकर समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे? वे सभी व्यापारी मर गए वो वहां से भाग निकली और दमयंती भागकर उन ब्राह्मणों के पास पहुंची और उनके साथ चलने लगी शाम के समय वह राजा सुबाहु के यहां जा पहुंची। वहां उसे सब बावली समझ रहे थे। उसे बच्चे परेशान कर रहे थे।

उस समय राज माता महल के बाहर खिड़की से देख रही थी उन्होंने अपनी दासी से कहा देखो तो वह स्त्री बहुत दुखी मालुम होती है। तुम जाओ और मेरे पास ले आओ। दासी दमयंती को रानी के पास ले गई। रानी ने दमयंती स पूछा तुम्हे डर नहीं लगता ऐसे घुमते हुए। तब दमयंती ने बोला में एक पतिव्रता स्त्री हूं। मैं हूं तो कुलीन पर दासी का काम करती हूं। तब रानी ने बोला ठीक है तुम महल में ही रह जाओ। तब दमयंती कहती है कि मैं यहां रह तो जाऊंगी पर मेरी तीन शर्त है मैं झूठा नहीं खाऊंगी, पैर नहीं धोऊंगी और परपुरुष से बात नहीं करुंगी। रानी ने कहा ठीक है हमें आपकी शर्ते मंजुर है।

जैसे ही राजा ने कहा दश सांप ने डंस दिया

जिस समय राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में आग लग रही थी। तभी नल को आवाज आई। राजा नल शीघ्र दौड़ो। मुझे बचाओ। नागराज कुंडली बांधकर पड़ा हुआ था। उसने नल से कहा- राजन मैं कर्कोटक नाम का सर्प हूं। मैंने नारद मुनि को धोखा दिया था। उन्होंने शाप दिया कि जब तक राजा नल तुम्हे न उठावे, तब तक यहीं पड़े रहना। उनके उठाने पर तू शाप से छूट जाएगा। उनके शाप के कारण मैं यहां से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकता। तुम इस शाप से मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हे हित की बात बताऊंगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊंगा। मेरे भार से डरो मत मैं अभी हल्का हो जाता हूं वह अंगूठे के बराबर हो गया। नल उसे उठाकर दावानल से बाहर ले आए। कार्कोटक ने कहा तुम अभी मुझे जमीन पर मत डालो। कुछ कदम गिनकर चलो। राजा नल ने ज्यो ही पृथ्वी पर दसवां कदम चला और उन्होंने कहा दश तो ही कर्कोटक ने उन्हें डस लिया। उसका नियम था कि जब कोई बोले दश तभी वह डंसता था।

आश्चर्य चकित नल से उसने कहा महाराज तुम्हे कोई पहचान ना सके इसलिए मैंने डस के तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुग ने तुम्हे बहुत दुख दिया है। अब मेरे विष से वह तुम्हारे शरीर में बहुत दुखी रहेगा। तुमने मेरी रक्षा की है। अब तुम्हे हिंसक पशु-पक्षी शत्रु का कोई भय नहीं रहेगा। अब तुम पर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में हमेशा तुम्हारी जीत होगी।

राजा बन गया सारथी

यह कहकर कर्कोटक ने दो दिव्य वस्त्र दिए और वह अंर्तध्यान हो गया। राजा नल वहां से चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुंच गया। उन्होंने वहां राजदरबार में निवेदन किया कि मेरा नाम बाहुक है। मैं घोड़ों को हांकने और उन्हें तरह-तरह की चालें सिखाने का काम करता हूं। घोड़ो की विद्या मेरे जैसा निपुण इस समय पृथ्वी पर कोई नहीं है। रसोई बनाने में भी में बहुत चतुर हूं, हस्तकौशल के सभी काम और दूसरे कठिन काम करने की चेष्ठा करूंगा।

आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिए। उसकी सारी बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने कहा बाहुक मैं सारा काम तुम्हें सौंपता हूं। लेकिन मैं शीघ्रगामी सवारी को विशेष पसंद करता हूं। तुम्हे हर महीने सोने की दस हजार मुहरें मिला करेंगी। लेकिन तुम कुछ ऐसा करो कि मेरे घोड़ों कि चाल तेज हो जाए। इसके अलावा तुम्हारे साथ वाष्र्णेय और जीवल हमेशा उपस्थित रहेंगें।

राजा नल रोज दमयन्ती को याद करते और दुखी होते कि दमयन्ती भूख-प्यास से परेशान ना जाने किस स्थिति में होगी। इसी तरह राजा नल ने दमयंती के बारे में सोचते हुए कई दिन बिता दिए। ऋतुपर्ण के पास रहते हुए उन्हें कोई ना पहचान सका। जब राजा विदर्भ को यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल और पुत्री राज पाठ विहिन होकर वन में चले गए हैं।

राजमाता ने कैसे पहचाना रानी को?

तब उन्होंने सुदेव नाम के एक ब्राह्मण को नल-दमयंती का पता लगाने के लिए चेदिनरेश के राज्य में भेजा। उसने एक दिन राज महल में दमयंती को देख लिया। उस समय राजा के महल में पुण्याहवाचन हो रहा था। दमयंती- सुनन्दा एक साथ बैठकर ही वह कार्यक्रम देख रही थी। सुदेव ब्राह्मण ने दमयंती को देखकर सोचा कि वास्तव में यही भीमक नन्दिनी है। मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था। वैसा अब भी देख रहा हूं। बड़ा अच्छा हुआ, इसे देख लेने से मेरी पुरी यात्रा सफल हो गई। सुदेव दमयंती के पास गया और उससे बोला दमयंती मैं तुम्हारे भाई का मित्र सुदेव हूं। मैं तुम्हारी भाई की आज्ञा से तुम्हे ढ़ूढने यहां आया हूं। दमयंती ने ब्राह्मण को पहचान लिया। वह सबका कुशल-मंगल पूछने लगी और पूछते ही पूछते रो पड़ी।

सुनन्दा दमयंती को रोता देख घबरा गई। उसने अपनी माता के पास जाकर उन्हें सारी बात बताई। राज माता तुरंत अपने महल से बाहर निकल कर आयी। ब्राह्मण के पास जाकर पूछने लगी महाराज ये किसकी पत्नी है? किसकी पुत्री है? अपने घर वालों से कैसे बिछुड़ गए? तब सुदेव ने उनका पूरा परिचय उसे दिया। सुनन्दा ने अपने हाथों से दमयंती का ललाट धो दिया। जिससे उसकी भौहों के बीच का लाल चिन्ह चन्द्रमा के समान प्रकट हो गया। उसके ललाट का वह तिल देखकर सुनन्दा व राजमाता दोनों ही रो पड़े। राजमाता ने कहा मैंने इस तिल को देखकर पहचान लिया कि तुम मेरी बहन की पुत्री हो। उसके बाद दमयंती अपने पिता के घर चली गई।

तब खत्म हुई रानी की खोज

अपने पिता के घर एक दिन विश्राम करके दमयंती अपनी माता से कहा कि मां मैं आपसे सच कहती हूं। यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो आप मेरे पतिदेव को ढूंढवा दीजिए। रानी ने उनकी बात सुनकर नल को ढूंढवाने के लिए ब्राह्मणों को नियुक्त किया। ब्राह्मणों से दमयंती ने कहा आप लोग जहां भी जाए वहां भीड़ में जाकर यह कहे कि मेरे प्यारे छलिया, तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर अपनी दासी को उसी अवस्था में आधी साड़ी में आपका इंतजार कर रही है। मेरी दशा का वर्णन कर दीजिएगा और ऐसी बात कहिएगा।

जिससे वे प्रसन्न हो और मुझ पर कृपा करे। बहुत दिनों के बाद एक ब्राह्मण वापस आया। उसने दमयंती से कहा मैंने राजा ऋतुपर्ण के पास जाकर भरी सभा में आपकी बात दोहराई तो किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया। जब मैं चलने लगा तब बाहुक नाम के सारथि ने मुझे एकान्त में बुलाया उसके हाथ छोटे व शरीर कुरूप है। वह लम्बी सांस लेकर रोता हुआ मुझसे कहने लगा।

उच्च कुल की स्त्रियों के पति उन्हें छोड़ भी देते हैं तो भी वे अपने शील की रक्षा करती हैं। त्याग करने वाला पुरुष विपत्ति के कारण दुखी और अचेत हो रहा था। इसीलिए उस पर क्रोध करना उचित नहीं है। लेकिन वह उस समय बहुत परेशान था।जब वह अपनी प्राणरक्षा के लिए जीविका चाह रहा था। तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गए। जब ब्राह्मण ने यह बात बताई तो दमयंती समझ गई कि वे राजा नल ही हैं।

इसलिए रानी ने फिर से रचाया स्वयंवर..

ब्राह्मण की बात सुनकर दमयंती की आंखों में आंसु भर आए। उसने अपनी माता को सारी बात बताई। तब उन्होंने कहा आप यह बात अब अपने पिताजी से ना कहे। मैं सुदैव ब्राह्मण को इस काम के लिए नियुक्त करती हूं। तब दमयंती ने सुदेव से कहा- ब्राह्मण देवता आप जल्दी से जल्दी अयोध्या नगरी पहुंचे। राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिए कि दमयंती ने फिर से स्वेच्छानुसार पति का चुनाव करना चाहती है।

बड़े-बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं। स्वयंवर की तिथि कल ही है। इसलिए यदि आप पहुंच सकें तो वहां जाइए। नल के जीने अथवा मरने का किसी को पता नहीं है, इसलिए वह इसीलिए कल वे सूर्योदय पूर्व ही पति वरण करेंगी। दमयंती की बात सुनकर सुदेव अयोध्या गए और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से सब बातें कह दी। सुदेव की बातें सुनाकर बाहुक को बुलाया और कहा बाहुक कल दमयंती का स्वयंवर है और हमें जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना है। यदि तुम मुझे जल्दी वहाँ  पहुंच जाना संभव समझो तभी मैं वहां जाऊंगा।

ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा। सोचा कि दमयंती ने दुखी और अचेत होकर ही ऐसा किया होगा। संभव है वह ऐसा करना चाहती हो। नल ने शीघ्रगामी रथ में चार श्रेष्ठ घोड़े जोत लिए। राजा ऋतुपर्ण रथ पर सवार हो गए। रास्ते में ऋतुपर्ण ने उसे पासें पर वशीकरण की विद्या सिखाई क्योंकि उसे घोड़ों की विद्या सीखने का लालच था। जिस समय राजा नल ने यह विद्या सीखी उसी समय कलियुग राजा नल के शरीर से बाहर आ गया।

रानी ने राजा को पहचानने के लिए क्या किया?

कलियुग ने नल का पीछा छोड़ दिया था। लेकिन अभी उनका रूप नहीं बदला था। उन्होंने अपने रथ को जोर से हांका और शाम होते-होते वे विदर्भ देश में पहुंचे। राजा भीमक के पास समाचार भेजा गया। उन्होंने ऋतुपर्ण को अपने यहां बुला लिया ऋतुपर्ण के रथ की गुंज से दिशाएं गुंज उठी। दमयंती रथ की घरघराहट से समझ गई कि जरूर इसको हांकने वाले मेरे पति देव हैं। यदि आज वे मेरे पास नहीं आएंगे तो मैं आग में कुद जाऊंगी।

उसके बाद अयोध्या नरेश ऋतुपर्ण जब राजा भीमक के दरबार में पहुंचे तो उनका बहुत आदर सत्कार हुआ। भीमक को इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि वे स्वयंवर का निमंत्रण पाकर यहां आए हैं। जब ऋतुपर्ण ने स्वयंवर की कोई तैयारी नहीं देखी तो उन्होंने स्वयंवर की बात दबा दी और कहा मैं तो सिर्फ आपको प्रणाम करने चला आया। भीमक सोचने लगे कि सौ-योजन से अधिक दूर कोई प्रणाम कहने तो नहीं आ सकता। लेकिन वे यह सोच छोड़कर भीमक के सत्कार में लग गए। बाहुक वाष्र्णेय के साथ अश्वशाला में ठहरकर घोड़ो की सेवा में लग गया। दमयंती आकुल हो गई कि रथ कि ध्वनि तो सुनाई दे रही है पर कहीं भी

मेरे पति के दर्शन नहीं हो रहे। हो ना हो वाष्र्णेय ने उनसे रथ विद्या सीख ली होगी। तब उसने अपनी दासी से कहा हे दासी तु जा और इस बात का पता लगा कि यह कुरूप पुरुष कौन है? संभव है कि यही हमारे पतिदेव हों। मैंने ब्राह्मणों द्वारा जो संदेश भेजा था। वही उसे बतलाना और उसका उत्तर मुझसे कहना। तब दासी ने बाहुक से जाकर पूछा राजा नल कहा है क्या तुम उन्हें जानते हो या तुम्हारा सारथि वाष्र्णेय जानता है? बाहुक ने कहा मुझे उसके संबंध में कुछ भी मालुम नहीं है सिर्फ इतना ही पता है कि इस समय नल का रूप बदल गया है। वे छिपकर रहते हैं। उन्हें या तो दमयंती या स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयंती क्योंकि वे अपने गुप्त चिन्हों को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहते हैं।

इस तरह हुआ अमर प्रेम कहानी का सुखद अंत

अब दमयंती की आशंका और बढ़ गई और दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल है। उसने दासी से कहा तुम फिर बाहुक के पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो। उसकी चेष्टाओं पर ध्यान दो। अब आग मांगे तो मत देना जल मांगे तो देर कर देना। उसका एक-एक चरित्र मुझे आकर बताओ।

फिर वह मनुष्यों और देवताओं से उसमें बहुत से चरित्र देखकर वह दमयंती के पास आई और बोली बाहुक ने हर तरह से अग्रि, जल व थल पर विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आज तक ऐसा पुरुष नहीं देखा। तब दमयंती को विश्वास हो जाता है कि वह बाहुक ही राजा नल है।

अब दमयंती ने सारी बात अपनी माता को बताकर कहा कि अब मैं स्वयं उस बाहुक की परीक्षा लेना चाहती हूं। इसलिए आप बाहुक को मेरे महल में आने की आज्ञा दीजिए। आपकी इच्छा हो तो पिताजी को बता दीजिए। रानी ने अपने पति भीमक से अनुमति ली और बाहुक को रानीवास बुलवाने की आज्ञा दी। दमयंती ने बाहुक के सामने फिर सारी बात दोहराई। तब दमयंती के आखों से आंसू टपकते देखकर नल से रहा नहीं गया। नल ने कहा मैंने तुम्हे जानबुझकर नहीं छोड़ा। नहीं जूआ खेला यह सब कलियुग की करतूत है। दमयंती ने कहा कि मैं आपके चरणों को स्पर्श करके कहती हूं कि मैंने कभी मन से पर पुरुष का चिंतन नहीं किया हो तो मेरे प्राणों का नाश हो जाए।

ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेह छोड़ दिया और कार्कोटक नाग के दिए वस्त्र को अपने ऊपर ओढ़कर उसका स्मरण करके वे फिर असली रूप में आ गए। दोनों ने सबका आर्शीवाद लिया दमयंती के मायके से उन्हें खुब धन देकर विदा किया गया। उसके बाद नल व दमयंती अपने राज्य में पहुंचे। राजा नल ने पुष्कर से फिर जूआं खेलने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो गया और नल ने जूए की हर बाजी को जीत लिया। इस तरह नल व दमयंती को फिर से अपना राज्य व धन प्राप्त हो गया।

Thursday, March 12, 2015

Maharishi Valmiki

इंसान की अगर इच्छा शक्ति उसके साथ हो तो वह कोई भी काम बड़े आराम से कर सकता है. इच्छाशक्ति और दृढ़संकल्प इंसान को रंक से राजा बना देती है और एक अज्ञानी को महान ज्ञानी. भारतीय इतिहास में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी की जीवनकथा भी हमें दृढ़संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति अर्जित करने की तरफ अग्रसर करती है. कभी रत्नाकर के नाम से चोरी और लूटपाट करने वाले वाल्मीकि जी ने अपने संकल्प से खुद को आदिकवि के स्थान तक पहुंचाया और “वाल्मीकि रामायण” के रचयिता बने. आइए आज इन महान कवि की जीवन यात्रा पर एक नजर डालें.
रत्नाकर के पिता का नाम परचेतस् ऋषि था और माँ का नाम चरसहनी था । 
दस्यु (डाकू) रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक रत्नाकर नाम का दस्यु था जो अपने इलाके से आने-जाने वाले यात्रियों को लूटकर अपने परिवार का भरण पोषण  करता था. एक बार नारद मुनि भी इस दस्यु के शिकार बने. जब रत्नाकर ने उन्हें मारने का प्रयत्न किया तो नारद जी ने पूछा – तुम यह अपराध क्यूं करते हो?

रत्नाकर: अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए?
नारद मुनि: अच्छा तो क्या जिस परिवार के लिए तुम यह अपराध करते हो वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार है ?

इसको सुनकर रत्नाकर ने नारद मुनि को पेड़ से बांध दिया और प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अपने घर चला गया. घर जाकर उसने अपने परिवार वालों से यह सवाल किया लेकिन उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कोई भी उसके पाप में भागीदार नहीं बनना चाहता.

घर से लौटकर उसने नारद जी को स्वतंत्र कर दिया और अपने पापों का प्रायश्चित करने की मंशा जाहिर की. इस पर नारद जी ने उसे धैर्य बंधाया और राम नाम जप करने का उपदेश दिया. लेकिन भूलवश वाल्मीकि राम-राम की जगह ‘मरा-मरा’ का जप करते हुए तपस्या में लीन हो गए. इसी तपस्या के फलस्वरूप ही वह वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामायण की महान रचना की.

संस्कृत का पहला श्लोक
महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी एक और घटना है जिसका वर्णन अत्यंत आवश्यक है. एक बार महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे. वह जोड़ा प्रेम करने में लीन था. पक्षियों को देखकर महर्षि वाल्मीकि न केवल अत्यंत प्रसन्न हुए, बल्कि सृष्टि की इस अनुपम कृति की प्रशंसा भी की. इतने में एक पक्षी को एक बाण आ लगा, जिससे उसकी जीवन -लीला तुरंत समाप्त हो गई. यह देख मुनि अत्यंत क्रोधित हुए और शिकारी को संस्कृत में कुछ श्लोक कहा. मुनि द्वारा बोला गया यह श्लोक ही संस्कृत भाषा का पहला श्लोक माना जाता है.

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥‘

(अरे बहेलिये, तूने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है. जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी)

वाल्मीकि रामायण
महर्षि वाल्मीकि ने ही संस्कृत में रामायण की रचना की. उनके द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई. रामायण एक महाकाव्य है जो कि श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य से, कर्तव्य से, परिचित करवाता है. वाल्मीकि रामायण में भगवान राम को एक साधारण मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया है. एक ऐसा मानव, जिन्होंने संपूर्ण मानव जाति के समक्ष एक आदर्श उपस्थित किया. रामायण प्राचीन भारत का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है.

Tuesday, November 4, 2014

Yaksh Prashn

यक्ष ने प्रश्न किया – मनुष्य का साथ कौन देता है?
युधिष्ठिर ने कहा – धैर्य ही मनुष्य का साथ देता है.
यक्ष – यशलाभ का एकमात्र उपाय क्या है?
युधिष्ठिर – दान.
यक्ष – हवा से तेज कौन चलता है?
युधिष्ठिर – मन.
यक्ष – विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है?
युधिष्ठिर – विद्या.
यक्ष – किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है?
युधिष्ठिर – अहम् भाव से उत्पन्न गर्व के छूट जाने पर.
यक्ष – किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता?
युधिष्ठिर – क्रोध.
यक्ष – किस चीज़ को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
युधिष्ठिर – लोभ.
यक्ष – ब्राम्हण होना किस बात पर निर्भर है? जन्म पर, विद्या पर, या शीतल स्वभाव पर?
युधिष्ठिर – शीतल स्वभाव पर.
यक्ष – कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
युधिष्ठिर – अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है.
यक्ष – सर्वोत्तम लाभ क्या है?
युधिष्ठिर – आरोग्य.
यक्ष – धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है?
युधिष्ठिर – दया.
यक्ष – कैसे व्यक्ति के साथ की गयी मित्रता पुरानी नहीं पड़ती?
युधिष्ठिर – सज्जनों के साथ की गयी मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती.
यक्ष – इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर – रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं फिर भी सभी को अनंतकाल तक जीते रहने की इच्छा होती है. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?

Tuesday, October 14, 2014

Maha Mrityunjaya Mantra








ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

In some Hindu religious books the complete mantra is preceded by oṁ hrauṁ jūṁ saḥ / oṁ bhūrbhuvaḥ svaḥ and followed by oṁ svaḥ bhuvaḥ bhūr / oṁ saḥ jūṁ hrauṁ oṁ, which is its Tantric version

The Maha Mrityunjaya Mantra is said to have been found by Rishi Markandeya. It was a secret mantra, and Rishi Markandeya was the only one in the world who knew this mantra. The Moon was once in trouble, cursed by King Daksha. Rishi Markandeya gave the Mahamritryunjaya Mantra to SatiDaksha's daughter, for the Moon. 

The Day it was originated was Fagun Krishn Paksh's Chaturdashi 
फागुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी 
The same day when Lord Shiva gets free from Curse by Daksha and Moon also got cured by the help of Maha Mrityunjaya Mantra. 
On that place Moon built a Temple Called Shri Somnath. (one of the 12 Jotirlingas). 

Few Years later on the very same Day Lord Shiva gets married to Godess Parvati and 
Thats why The same Day is also known as Maha Shivratri

Literal Meaning of the Maha Mrityunjaya Mantra


Word-by-word meaning of the Maha Mrityunjaya Mantra:-

  •  oṁ = is a sacred/mystical syllable in Sanatan Dharma or hindu religions, i.e. Hinduism, Jainism, Buddhism.
  • त्र्यम्बकम् tryambakam = the three-eyed one (accusative case),

त्रि + अम्बकम् = tri + ambakam = three + eye

  • यजामहे yajāmahe = We worship, adore, honour, revere,
  • सुगन्धिम् sugandhim = sweet smelling, fragrant (accusative case),
  • पुष्टि puṣṭi = A well-nourished condition, thriving, prosperous, fullness of life,
  • वर्धनम् vardhanam = One who nourishes, strengthens, causes to increase (in health, wealth, well-being); who gladdens, exhilarates, and restores health; a good gardener,

पुष्टि-वर्धनम् = puṣṭi+vardhanam = पुष्टि: वर्धते अनेन तत् = puṣṭiḥ vardhate anena tat (samas)= The one who nourishes someone else and gives his life fullness.
  • उर्वारुकमिव urvārukamiva = like the cucumber or melon (in the accusative case),
Note: Some people have decomposed the compound urvārukam in this way: 'urva' means "vishal" or big and powerful or deadly; 'arukam' means 'disease'. But urva (उर्वा) does not mean 'vishal' in Sanskrit; rather it is cognate with the Hindi word oorva (ऊर्वा); so this translation is not correct.
  • बन्धनान् bandhanān = "from captivity" {i.e. from the stem of the cucumber} (of the gourd); (the ending is actually long a, then -t, which changes to n/anusvara because of sandhi)
Note: bandhanān means bound down. Thus, read with urvārukam iva, it means 'I am bound down just like a cucumber (to a vine)'.
  • मृत्योर्मुक्षीय mṛtyormukṣīya = Free, liberate From death
मृत्यु: + मुक्षीय = mṛtyuḥ + mukṣīya= from death + free (Vedic usage)
  • मा ∫ मृतात् mā ∫ mṛtāt = (give) me immortality, emancipation
Note: Here are two possible combinations
1) मा + अमृतात् = mā + amṛtāt = not + immortality, nectar
Translation would be: (Free me from death but) not from immortality.
2) मा (माम) + अमृतात् = mā (short form of mām) + amṛtāt = myself + sure, definitely
Translation would be: Free me from certain death.


Wednesday, October 23, 2013

Harishchandra ( Satyawadi Raja Harishchandra )

प्रथम दृश्य  - ( देवेन्द्र का दरबार )

द्वारपाल: राजाधिराज! देवर्षि नारद प्रवेश कर रहे हैं।
इन्द्र: सादर लाओ, मैं ऋषिवर का दर्शन कर लोचन कृतार्थ करूँ।
द्वारपाल: यथाज्ञापयतु !

( दिव्य शरीर नारद का प्रवेश। करतल वीणा पर नारायण-नारायण का मधुर स्वर झंकृत है। )

इन्द्र: ( हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए सिंहासन से उठ खड़े होते हैं )  आइये देवर्षि! मेरा परम सौभाग्य है कि आपके पद-पद्म अमरावती में पधारे। आसन ग्रहण करें देवर्षि!

नारद: देवाधिपति! परिभ्रमण तो अपना स्वभाव ही है, परिक्रमा अपनी दिनचर्या है, चरैवेति-चरैवेति जीवन-मंत्र है। स्थिरता तो मरण में है, जीवन में कहाँ! चलना ही केवल चलना है, जीवन चलता ही रहता है।

इन्द्र: आप कृपालु हैं। मैं कृतकृत्य हुआ। कहाँ से आना हो रहा है? उत्सुक हूँ कि श्रीमुख से कुछ सुनूँ।

नारद: अभी तो धराधाम से चला हूँ। ब्रह्मलोक जाने का मन था, सुरपुर की संगीतमय लहरी सुन ठिठक गया। ऐसा ही रुचिर ऋतुराज लेकर काम हिमगिरि पर मुझे स्खलित करने गया था। हरि इच्छा। वही स्मृति हुई। आपसे मिलने आ गया। हूँ तो मैं स्वर्ग लोक में पर मन बँधा है मृतलोक में ही। इन्द्र! मानव भी कितना गरिमामय है।

इन्द्र: हे मनोजमदमर्दन ऋषि! मृत्युलोक के किस महामानव ने आपको अभिभूत किया है?

नारद: अयोध्या नरेश हरिश्चन्द्र। त्रिशंकु सुत हरिश्चन्द्र की यशोगाथा दशोदिगंत में गूँज रही है। सत्य की तो वह प्रतिमूर्ति ही है। पवन का प्रत्येक झोंका जैसे यही प्रतिध्वनित कर रहा था-

"चन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार । पै दृढ़वत हरिश्चन्द्र को टरै न सत्य विचार॥"

ऐसा महापुरुष ही दैदीप्यमान भारत की अनुपम तेजस्विता है। सत्य तो उस राजा के लिए प्रभु का चरणामृत है। झोपड़ी से लेकर राजप्रासाद तक वह मुक्तहस्त वितरित हो रहा है। धन्य है ऐसा भूपाल।

इन्द्र: (हृदय ईर्ष्या से उद्वेलित हो रहा है) (स्वगत) हृदय भी ईश्वर ने क्या वस्तु बनाई है। जो जितना ही बड़ा, उसकी ईर्ष्या उतनी ही बड़ी। (प्रकट) ऋषिवर! जिसकी प्रशंसा आप जैसा निस्पृह व्यक्ति करे, वह बड़ा तो होगा ही। चरित्र उद्घाटित करें ऋषिवर!

नारद: कहीं खो गए हैं आप! हरिश्चन्द्र तो सत्यवादिता का सामगान है। उसका मन,वचन, कर्म एक है। जो कहता है वही करता है ।  सर्वोत्तम उपलब्धि तो यह है देवराज कि पृथ्वी हरिश्चन्द्र के राज्य में कामदुग्धा हो गयी है। प्रजा का सुख ही राजा का सुख है। सर्वत्र सुख है, शांति है, सौहार्द्र है, मोद है, मंगल है। सत्यवादी हरिश्चन्द्र का होना मानवता की महत्तम शोभा है।

इन्द्र: (स्वगत) अब तो पाषाण हृदय पर रखकर बड़ाई सुन रहा हूँ। राजा को इन्द्र पद का लोभ उठना स्वाभाविक है, मैं इसे कैसे सहन कर सकूँगा। (प्रकट) ऐसा व्यक्ति तो सहज ही स्वर्गारोहण कर जाता है न ऋषिवर!

नारद: जो सत्य की सम्पदा को अपने हृदय का हार बनाये हो उसके लिए तुच्छ स्वर्ग की क्या कीमत? पद प्रतिष्ठा तो सत्य निष्ठा के चरण तले स्वयमेव लोटती रहती है। चरित्र ही महापुरुषों का स्वर्ग है।

इन्द्र: हरिश्चन्द्र का कुटुम्ब भी हरिश्चन्द्र ही है क्या देवर्षि?

नारद: सुरवर! रानी शव्या और सुकुमार रोहिताश्व की बात निराली ही है। जगत विकारों की अन्धतिमिर गली में वे सद्गु्णों की निष्कंप दीपशिखा हैं। उन्हें ही नहीं, अयोध्या की सारी प्रजा को हमने श्रुति नीति में पारंगत देखा। न कहीं द्वेष, न क्षोभ, न ईर्ष्या, न उन्माद। सम्पूर्ण प्रजा ही हरिश्चन्द्र का कुटुम्ब है। सभी सत्य, धर्म, शील के आगार। दातावृत्ति तो उनके रुधिर में है।

इन्द्र: ऋषिवर! क्या दान देते-देते लक्ष्मी क्षीण नहीं हो जायेंगी?

नारद: दाता मन हो तो भर्ता विश्वंभर है। शतगुणा लेकर सहस्रगुणा नीरदाता मेघ क्या फिर-फिर भर-भर नहीं जाते हैं। सागर की वाष्पीभूत जलराशि धारासार वृष्टि से धरित्री की छाती शीतल कर देती है न! क्या चन्द्र बिम्ब के चुम्बन की कसक समेटे सागर कभी रीता हुआ है? धर्मशील के पास सुख-संपत्ति बुलाये बिना ही चली जाती है।

इन्द्र: (स्वगत) मेरा तो कलेजा ही बैठा जा रहा है। चाहे जैसे भी हो हरिश्चन्द्र का पतन करना ही होगा। (प्रकट) हे मुनिश्रेष्ठ! मानव इतना गुणवान होगा, हमको तो इसका पता न था। आप प्रशंसा कर रहे हैं तो सत्य ही.......

नारद: सदय हृदय, परोपकारी मन, धर्मव्रती किससे वंदनीय नहीं होते? उस राजा के धर्मविभव के आगे तुम्हारा नंदनवन, वनितादिक भोग, अक्षय क्रीड़ा-कल्लोल सब तुच्छ है, तृणवत है।

इन्द्र: (मन ही मन) भले ही राजा की स्वर्ग लेने की इच्छा न हो, किन्तु एक बार तो उसके सत्य की परीक्षा अवश्य लेंगे। नारद ने तो बड़ी बेचैनी पैदा कर दी। (प्रकट) क्या मुनिवर, हरिश्चन्द्र जो कह देते हैं, वह किसी को अवश्य दे देते हैं?

नारद: निःसन्देह। सत्य ही उसका गुरु है, प्राण प्रधान शिष्य। परोपकार ही संकल्प है। अस्मिता ही हवन है, आतिथ्य ही नित्य विष्णुयज्ञ है। सेवा परायणता ही दक्षिणा है। धर्म ही ध्वजारोहण है। सत्य रूपी सद्गुरु की चरणपादुका का जल ही उसका चरणामृत है। वह स्वयं अपने आप में तीर्थ है, तीर्थराज प्रयाग है। धर्मात्मा की जीवन शैली ही ऐसी होती है कि वह जीवन को आनंद और माधुर्य के साथ जी सके। देखो इन्द्र! आकाश में उड़ने के लिए केवल पंख ही आतुर नहीं हैं, आकाश स्वयं निमंत्रण देता है, पंछी आये और उन्मुक्त गगन में छलाँग लगाए। केवल प्यासा ही पानी पीने को तृष्णातुर नहीं है बल्कि नीर भी उतना ही आतुर है। प्यास दोनों में समान है। विराट पुरुष की ममतामयी बाहें सत्यनिष्ठ को बड़े ही मोद से झूला झुलाती हैं। इसलिए धन ही को सर्वस्व मत मान लेना। उससे भी सर्वोपरि बहुत कुछ है।

इन्द्र: मुझे विश्वास है आपकी बातों पर। राजा हरिश्चन्द्र का जीवन सत्य,दान और सद्भाव का कोष है। दूसरों के लिए उदाहरण बनने योग्य।

नारद: सुनो, "मनस्येकं वचस्येकं कर्ममेकं महात्मनाम्" ! सत्य से बढ़कर शरण कौन! हरिश्चन्द्र की प्रत्येक रुधिर की धड़कन में आप सुनेंगे -"सत्यं शरणं गच्छामि"। विष्णु उस संसार में अवतार लें या न लें लेकिन दुनिया में फिर-फिर हरिश्चन्द्र पैदा होना चाहिए। अब हमारा समय हुआ। चलते हैं। सुरपति! ईर्ष्यालु मत हो जाना। (प्रस्थान।)
 (दरवाजे पर आहट, द्वारपाल का प्रवेश)
द्वारपाल: महाराज, गाधितनय विश्वामित्र जी पधारे हैं।

इन्द्र: (स्वगत) भले गए नारद। अब द्वितीय दृश्य को चरितार्थ करना है। (द्वारपाल से) ससम्मान ले आओ ब्रह्मर्षि को। हमें उनकी नितान्त आवश्यकता है।
(द्वारपाल जाता है। ऋषि विश्वामित्र प्रवेश करते हैं।)

इन्द्र: (शिष्टाचारोपरान्त) आइये प्रभु, आपका स्वागत है। हमारी उद्विग्नता का सम्यक निदान आप से ही सम्भव है। अन्यथा न लें। सेवक हूँ। धृष्टता क्षमा करने की कृपा करेंगे।

विश्वामित्र: देवपति! ऐसा न सोचें। आपने कुछ अन्यथा या अनाचरणीय नहीं किया है। देवर्षि की वीणा सुनायी पड़ी है। स्वभाववश उन्होंने ही तो उद्विग्न नहीं कर दिया है आपको?

इन्द्र: (विनत सिर) हाँ प्रभु! नारद आये थे। हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता और दानशीलता का इतना बखान किया उन्होंने कि उच्चपदस्थ मैं आहत हो उठा। उन्होंने उनके सत्याचरण को आपकी तपस्या से गुरुतर बताया। कहा कि अखिल भुवन में हरिश्चन्द्र सा दानी न था न होगा। सभी विभवशाली जनों की सम्पदा, सभी तपोपूत ऋषियों की साधना, सभी कर्मयोगियों का कर्म हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा की तुलना नहीं कर सकते। मुझे अनर्गल प्रलाप लगा। सब सुनता तो रहा पर अंतर्द्वन्द्व से ग्रसित था कि क्या ऐसा संभव है! आप जैसा ऋषि जो दूसरी सृष्टि रच सकता है, जो ब्रह्मर्षि की गरिमा से संपन्न हो, वदंनीय वह है न कि वह नरपति जिसके यश का वर्णन करते नारद की वाणी नहीं थकती थी। आपके आने का आभास न मिल गया होता तो वे अभी न जाने कितना आकाश-पाताल एक करते। सहन नहीं हो रहा था ब्रह्मर्षि!

विश्वामित्र: (भृकुटी तन जाती है) हरिश्चन्द्र में कौन ऐसे गुण हैं जिनको नारद ने आपके आगे सराहा है? अयोध्या की राजकुल की वंशावली का हमें घट-घट पता है। सत्यान्वेषण, सत्य संपोषण हँसी ठट्ठा है क्या?

इन्द्र: ऋषिवर! सत्य की हरिश्चन्द्र सी मिसाल उनकी दृष्टि में धरा-धाम में कहीं है ही नहीं। वैसा सर्वगुणसम्पन्न राजा नारद की दृष्टि में किसी भी माता की कोख ने अभी तक नहीं जना है। कहाँ वह गृहासक्त वह राजा, कहाँ विरागी आप जैसे महात्मा! धर्म व्रत का, तप तितीक्षा का आपका गुण नारद के लिए अदृश्य था। भला राज्य निर्वहन करते और गृहकार्य में उलझे किसी मनुष्य के द्वारा धर्म का हथ निभ सकता है? कोई परीक्षा लेता तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाता!

विश्वामित्र: मैं अभी देखता हूँ देवराज! हरिश्चन्द्र की मिट्टी पलीद नहीं कर दी तो मेरा नाम विश्वामित्र नहीं। भूल गया वह कि उसी के तात त्रिशंकु को इस विश्वामित्र के तपोबल ने ही सदेह आकाश भेज दिया। मेरे सम्मुख तो आपने एक चुनौती रख दी। भला विश्वामित्र के सामने वह क्या सत्यवादी बनेगा! उसकी दानशीलता दुर्गति की किस सीमा तक पहुँचेगी, देखते रहना। यद्यपि हरिश्चन्द्र का मुझसे कोई व्यक्तिगत वैर नहीं है, किन्तु चाटुकारी की हद कर दी है नारद ने। परीक्षा करके ही मानूँगा।
(क्रोध पूर्वक उठकर चल देते हैं। पर्दा गिरता है।)

द्वितीय दृश्य - ( राजमहल का अंतःप्रकोष्ठ। )

राजा: ( शून्य में ऊपर निहारते हुए ) पुकार रहा हूँ। कब से, कब से पुकार रहा हूँ। कल भी पुकारूँगा। जब तक प्राण हैं, तब तक पुकारूँगा विप्रवर! तुम सुन रहे हो, तुम सुनोगे और मुझे कृतार्थ करोगे! मंगलमय, तुम्हारा विधान मंगलमय है। विस्मृत मत कर देना जीवनधन। हम पर कृपा करो, हमारी प्रार्थना सुन लो।

रानी: ( उठकर पास जाती है ) क्या है प्राणनाथ! कहाँ खोये हैं, किसे पुकार रहे हैं?

राजा: प्रिये क्या बताऊँ! स्वप्न में कहूँ या जागरण में ही। इसी कक्ष से किसी ने मुझे वातायन से बाहर खींच लिया। देखा, रक्तवर्ण की टेड़ी टूटी हुई उल्काएँ आकाश से पतित हो रही हैं। सूर्य मंडल से निकल कर रक्तवर्ण की मलिन विद्युत चन्द्रमंडल में प्रवेश कर रही है। भैंसे की आकृति वाले बादल एक पर एक चढ़कर दौड़ रहे हैं। धूम्रवर्णी संध्या क्रमशः मुझे घेरने चली आ रही है। प्रकृति अँगुली उठा कर कह रही है कि चेतो! मूर्तिकार की सर्वश्रेष्ठ कृति, सृष्टि का उपहार, पृथ्वी का सौन्दर्य पीड़ा में पनपता है। यह सनातन नियम है।

रानी: हाय महाराज! यह क्या?

राजा: और सुनो प्रिये! देखा कि विद्युत और धूलि से युक्त वायु अन्य वायु के साथ उर्ध्वगामी हो रहा है। दक्षिण दिशा की ओर गंधर्वनगर उग आया है। वहीं से एक प्रशस्त भाल ब्राह्मण सन्यासी याचक की मुद्रा में मेरे पास आता है, और वक्रहास के साथ मेरा सारा राजपाट मुझसे माँग लेता है। मैं यह कहकर कि लो दिया, संकल्प-जल धरती पर छोड़ता हूँ। फिर वह तिरोहित हो जाता है। नींच उचट गयी है। वही अब तो राज्याधिकारी है, मैं उसका आज्ञाकारी दास हूँ। मैं उसी विप्र सन्यासी को कब से पुकार रहा हूँ।

रानी: महाराज! स्वप्न स्वप्न है। सत्य नहीं। सपने को अपना मानकर क्यों बेचैन हो उठे हैं?

राजा: वल्लभे! आँख खुली है तो जो दृश्य है वही सत्य लगता है। पर आँख बन्द हुई तो यह मिथ्या, सपना नहीं हो जाता है। बन्द आँखों से जो दिखायी देता है क्या वह सत्य नहीं लगता है? कौन सत्य है, कैसे निर्णय हो! जब दिया तो दिया। क्या बन्द आँख, क्या खुली आँख - "धर्मस्य तत्वं निहितो गुहायाम्"।

रानी: ( टपकते हुए अश्रुजल से आर्द्र कपोलों को पोंछती हुई ) हृदय वल्लभे! मैंने भी बड़ा भयंकर स्वप्न देखा है। देखा है कि कनेर वृक्ष के फूल और पत्ते गिर रहे हैं। मैं उसी पुष्पपादप के नीचे बैठी हूँ। ऊपर एक विशाल लौह घंट लटक रहा है जो मेरे सिर पर अब गिरा तब गिरा। लाल माला से मेरे दोनों हाथ बाँध दिए गए हैं। भयंकर विकृत रूप वाली काली स्त्री रोहित को मुझसे दूर कहीं निर्जन झाड़ी में घसीटे लिए चली जा रही है। आप तैल्याभ्यक्त शरीर विभूति पोते लड़खड़ाते किसी कृष्ण सर्प के भय से भागते हुए दीख रहे हैं, और आप जैसा ही वर्णित तपस्वी मेरे भी अत्यंत समीप खड़ा हो गया है। उसकी क्रोधारुण आँखें देख भय से मैं जग गयी हूँ।

राजा: वल्लभे! शास्त्र वचन और परमात्मा कृपा का अवलंब लो। "जो पै राखिहैं राम तो मारिहैं को रे" ।कुल पुरोहित से शांति पाठ करा लो। विप्रों को दक्षिणा देकर संतुष्ट करो। रक्षासूत्र मेरे लाल की कलाई पर बाँध दो ताकि यदि कोई अनिष्ट हो तो उसका निवारण हो जाये। किन्तु स्मरण रखो प्रिये! तुम हरिश्चन्द्र की अर्धांगिनी हो। जागो, उठो। सपनों में ही मत खोयी रहो, साहसी बनो और सत्य के दर्शन करो। उससे, केवल उससे ही तादात्म्य स्थापित करो। छायाभासों को शान्त होने दो। यदि सपने ही देखना चाहो तो शाश्वत प्रेम, अखण्ड सत्य और निष्काम सेवाओं के ही सपने देखो। जागो, जागो। दाता ग्रहीता को पुका रहा है। मेरी पुकार में और बल दो। रोहिताश्व को ईश्वर अनुकंपा का रक्षासूत्र बाँधो। ’मंगलायतनो हरिः’। अरुणोदय बेला उपस्थित होने को है। सुनो, बंदी गा रहे हैं। प्रभात का स्वर मुखर है। राजकाज में हम सेवाभाव से संलग्न हों। संयत हो जाओ। अधमरा जीना भी क्या जीना। वीर वधू हो। जागो, जागो।

तृतीय दृश्य - ( राजा हरिश्चन्द्र का राजदरबार। हरिश्चन्द्र विकल, आँखे  जैसे किसी को खोज रही हैं । )

द्वारपाल : सत्यनिष्ठ महाराजाधिराज राजा हरिश्चन्द्र की जय हो। महाराज! एक अत्यंत क्रोधी ब्राह्मण द्वार पर बाँहें उठा-उठा कर चिल्ला रहा है। सबको गालियाँ दे रहा है। आप से मिलने की उसकी बड़ी बेचैनी है। वह तत्काल आपके दर्शन चाहता है।

राजा: विप्र देवता को आदर के साथ यहाँ ले आओ।

द्वारपाल: जो आज्ञा महाराज!

राजा: ( उठ साष्टांग प्रणाम करते हुए ) आइए विप्रवर! सपरिवार हम आपका अभिनन्दन करते हैं। आसनासीन होने की कृपा करें।

विश्वामित्र: रे क्षत्रिय कुल कलंक! बड़ा बना है बैठाने वाला। बैठ चुके, बैठ चुके। (हाथ उठाकर क्रोध से काँपते अधरों से) अरे पापिष्ट! धिक्कार है तेरी सत्यवादिता को। मिथ्यावाद का सहारा लेकर धर्मनिष्ठा का दुंदुभिनाद करते तुम्हें लज्जा नहीं आती है। कहाँ गया तेरा वचन! किस भाड़ में जल गया तेरा दान! कहाँ मर गया तेरा संकल्प! अरे नराधम मुझे पहचानता नहीं?

राजा: क्रोध शांत हो प्रभु! कुछ भ्रम हो रहा है। अपना परिचय देने का अनुग्रह करें।

विश्वामित्र: रे मू्ढ़! क्यों पहचानेगा तूँ? कुछ क्षण पहले की हो तो बात है। सारी पृथ्वी तूने मुझे दान कर दी थी। सारा राज्य मेरे हाथों में देकर क्या झूठे दानी बनने का स्वांग किया था! तुम्हारा पतन हो जायेगा। तू अभी स्वयं राजा बना बैठा है।

राजा: ( पैरों पर गिरकर ) महाराज! क्षमा कीजिए। स्वप्न में की गयी दान-क्रिया के पात्र को पहचान नहीं पाया। अब आपको जाना है। अपराध क्षमा हो। राज्य आपका है। आप राजा हैं। हम अनुचर। आपकी आज्ञा के अनुसार कार्य का निर्वाह करेंगे। मेरी सत्यनिष्ठा को कलंकित न करें देव! सत्य नहीं तो हम नहीं। अस्तित्व तो सत्य का है, व्यक्ति का नहीं। सत्य ही मेरा चिरंतन तारुण्य है। सत्य ही मेरा सनातन सौन्दर्य है। मेरी सत्यनिष्ठा नाशमय की परवाह नहीं करती। मेरी दानशीलता मेरे चेतना के क्षितिज पर निरविच्छिन्ना ज्योति-सरिता सी निरन्तर बहती रहती है। आप आज्ञा करें। दास स्वीकार करने को तत्पर है।

विश्वामित्र: ( टपकते हुए अश्रुजल से आर्द्र कपोलों को पोंछती हुई ) अरे शेखी बखारने वाले पाखंडी! यदि तूँ सचमुच सूर्यवंशी है, यदि तुम्हें सचमुच अपने वचन का निर्वाह करना है तो दे मेरी पृथ्वी!

राजा: तैयार हूँ देव! अब विलम्ब क्या! मैं तो पहले से ही सिंहासन खाली कर भूमि पर आसीन हूँ।

विश्वामित्र: दान के बाद की दक्षिणा कहाँ है?

राजा: ( मंत्री की ओर देखकर ) आमात्य! एक सहस्र स्वर्णमुद्रायें दक्षिणा-स्वरूप कोष से लाकर विप्र को प्रदान की जाँय।

विश्वामित्र: ( तमतमाते हुए ) रे अभिमानी! अभी क्या तुम कोष के अधिकारी ही बने बैठे हो! जब सब दान में दे दिया तो क्या खजाना खँगालने से बाज नहीं आयेगा। सारा राज्य, कोष, गृह, परिचर अब मेरे हैं। एक क्षण का भी विलम्ब किए बिना निकल जा यहाँ से। तुम्हारा शरीर, तुम्हारी धर्मपत्नी और तुम्हारे तनय के अतिरिक्त कुछ भी तुम्हारा नहीं है। बंधन, मर्यादा, लाज, शील, विवेक को तिलांजलि मत दो। जा बाहर! रही दक्षिणा की एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ! इसके लिए तुम्हें एक माह का समय देता हूँ। समय चुका तो मैं अपना ब्रह्मदंड गिरा कर तुम्हें चूर-चूर कर दूँगा।

राजा: विप्रदेवता! ब्रह्मदंड से अधिक मुझे सत्यदंड का भय है। मुझे आज्ञा दें। समय के भीतर ही आपकी दक्षिणा चुका दूँगा। वचन ही हमारा धन है। मैं चला। गुरुवर चरणों मे सादर प्रणाम है।

( राजा पत्नी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व को लेकर राजमहल से बाहर निकल पड़ते हैं। पुत्र, पत्नी समेत अंजलि जोड़कर अपनी प्रिय प्रजा और पुरी को प्रणाम करते हैं। )
विश्वामित्र: ( स्वगत ) अभी तो तुम्हे लक्ष्मी भ्रष्ट किया है। अब तुम्हें सत्य भ्रष्ट करके ही दम लूँगा। (प्रकट) जा क्षत्रिय राजा! जल्दी जा! दानी मोह को भी छोड़ने में नहीं हिचकते। हाँ, ध्यान रखना अपने इतने बड़े दान की दक्षिणा का। माह की अवधि भूले नहीं।

( हरिश्चन्द्र चल पड़ते हैं। सोचते हैं कहाँ जाऊँ? सब तो दान दे दिया। उस ब्राह्मण की आँखे पीछे लगी हैं। पत्नी-पुत्र छाया की तरह पीछे-पीछे चले जा रहे हैं )

रानी: मेरे प्राणनाथ! कहाँ चलेंगे? यात्रा के अपशकुन हो रहे हैं। सूर्य को परिवेश से घिरा हुआ देख रही हूँ। पीछे शब्दसहित धूम जैसी आकृति वाली घिरी बदली है। दाहिनी आँख फड़क रही है। सामने ही रिक्त घट पड़ा है। मन में अशान्ति-सी है। क्या होना है?

राजा: धर्मज्ञे! जीवन की सफलता किसमें है? मायावाद की मनोहारिता में, भोगवाद की सरसता में, बन्धु-बांधव की अनुरक्ति में नहीं; सत्य की उपासना में, सद्धर्म के आचरण में। जो हो रहा है या जो होगा सब हमारे करुणा वरुणालय प्रभु का खेल है। जीवन की चिन्ता नहीं, जीवनादर्श की चिन्ता करो। वास्तविक सुख और शान्ति उसके लिए है जो अपने को एक साथ ही वज्र के समान कठोर और पुष्प के समान सुकोमल बनाने में समर्थ होता है।

रानी: (आँसू पोंछती हुई) कहाँ चलना है?

राजा: सोचता हूँ काशी चलेंगे। यह त्रिभुवन से न्यारी है। भगवान भूतभावन शिव के त्रिशूल पर बसी है। वह किसी के राज्याधिकार में नहीं है। विश्वेश शिव हैं। धन नहीं, तन तो अपना है। हम अपना शरीर वहाँ बेचकर ब्राह्मण की दक्षिणा चुकाएँगे। शिवपुरी ही शरण है।

"गंगातरंग रमणीय जटाकलापं गौरी निरंतर विभूषित वामभागं।नारायणप्रियमनंगमदापहारं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाथ॥वाराणसी पुरपते मणिकर्णिकेश वीरेश दक्षमखकाल विभोगणेश।सर्वज्ञ सर्व हृदयैक निवासनाथ संसार दुःख गहनज्जगदीश रक्ष॥"

चतुर्थ दृश्य - ( काशी क्षेत्र का प्रवेश स्थल )

राजा: देवि! लो आ गयी वाराणसी नगरी। ’येषां क्वापि गतिर्नास्ति तेषां वाराणसी गतिः’। देख रही हो व्रतशीले! बेटे रोहिताश्व, देख रहे हो न कल-कल छल-छल बहती भगवती भागरथी की निर्मल धवल धारा!
(रोहिताश्व प्रसन्न होकर गंगा जल स्पर्श करता है। रानी सावधानी से उसकी बाँह पकड़े है।)
गंगा पुष्प माला की तरह काशी पुरी के अधिपति विश्वनाथ के गले में झूल गयी है। सादर प्रणाम करो!

रानी: महाराज! सुना है भूप भागीरथ ने अपने तपोबल से गंगा का यहाँ अवतरण कराया। जब से यह धराधाम पर प्रवाहित है तबसे इसमें स्नान करके न जाने कितने काक पिक हो गए और कितने वक मराल हो गए। हे सुरसरि! हमें सत्पथ पर चलते रहने का बल दो। ’जेते तुम तारे तेते नभ में न तारे हैं’। तुम्हारा नाम लेने से यमत्रास मिट जाती है। तुम्हारे जल का दर्शन करने से सारे ताप शमन हो जाते हैं। हम अकिंचन आज आप से सत्य-निर्वहन की भीख माँगते हैं। क्षत्रिय राजा और क्षत्राणी रानी की झोली भर दो माँ! ’भागीरथी हम दोष भरे पै भरोस यही कि परोस तिहारे’। (सिर झुकाकर प्रणाम करती है।)

राजा: देवि! यह सरिता नहीं, प्राणशक्ति है। गंगा बिन्दु बिन्दु में गोविन्द दरसतु है। किनारे ऋषियों के आश्रम हैं, घाट हैं, तरुमालाएँ हैं, इनका सुख कम नहीं है। पुष्प गंध से महमह करती फुलवारियों का मूर्ख माली ही एक पंखुड़ी के टूटने पर पश्चाताप करता है। कालचक्र का सम्मान करो। कुसुम से कुलिश बनने की कला कायाकल्प किए बिना रीता नहीं छोड़ेगी। अब हम पुरी के गर्भ गृह में प्रवेश करें, इसके पहले कोतवाल भैरव को नमन करें।

सभी : काशिकापुराधिनाथ काल भैरवं भजे।
(सिर नवाकर प्रणाम करते हैं। सभी थके पाँव मन्द गति से काशी की गली में प्रवेश करते हैं।)

राजा: देखो देवि! क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि यहाँ अद्भुत सत्य का आचमन हो रहा है। नटराज महाकाल की गोदी में मुक्ति बालिका ठुनक रही है । विश्वातीत ब्रह्म यहाँ की रज रज में लोट-पोट रहा है। यह भूमि तो दैदीप्यमान मातृत्व की अनुपम तेजस्विता ही है।

रानी: हाँ आर्यपुत्र! निःसन्देह यहाँ शान्ति का चिन्मय साम्राज्य है। पर न जाने क्यों मेरा मन एक अज्ञात अंधकूप के अंतराल में उतर रहा है। मेरे जीवन के पल को कोई अज्ञात अपनी धूपदान में डाल कर जला रहा है। क्लेशकर्षिता मैं क्या करूँ?

राजा: देवि! अन्तर की आहों का ज्वालामुखी फूटे उसके पहले ही हमें बन्धन तोड़कर सत्यमेव जयते की दुन्दुभि बजा देनी है। यह तुम्हारी साधना की सुहागरात है। दुख का मोल सुख से अधिक है। शांति तन से नहीं मन से मिलती है। सत्य निष्ठा के तैजस परमाणुओं में प्राणों का होम ही द्वंद्वातीत शांति है। तुम तो विवेकशीला हो। क्या गण्डकी की वेगवती लहरों में थपेड़े खाता, रगड़ाता पाषाण खंड शालिग्राम-शिला नहीं बन जाता?

रानी: आर्यपुत्र की जय हो! होनहार क्या है, कौन जान पाए?

राजा: (गली में घूमते हुए) अरे, सुनो काशीवासी लक्ष्मीपात्रों, सेठ साहूकारों, पुण्यात्मा धनी मानी महापुरुषों! किसी कारणवश पैसों की नितान्त आवश्यकता है। सपत्नीक एक दास अपने को बेच रहा है। कोई कृपा करके खरीद लेता। एक हजार मुद्राओं की आवश्यकता है। अरे सुनो भाई!
(कहते हुए इधर उधर भटक रहे हैं। रानी और रोहिताश्व लोगों की ओर तो कभी राजा के मुख की ओर निहार निहार कर रो रहे हैं। राजा स्वतः विचारों में डूबे हैं। सोच की मुद्रा है।)
कभी नर विक्रय को अन्याय मानने वाला मैं स्वयं ही यह कर्म कर रहा हूँ। हाय रे दैवगति। धरती फट जाती तो समा जाता। किन्तु ब्राह्मण की दक्षिणा दिए बिना….। (फिर गुहार लगाते हुए)….अरे, कोई दाता है जो हमें खरीद लेता! भाईयों कृपा करो।
(रोहिताश्व माँ का आँचल पकड़े सिसक रहा है। रानी पलकें पोंछ रही है। एक अग्निहोत्री ब्राह्मण अपने शिष्य के साथ सामने आता है।)

ब्राह्मण: देखो, यह कुलीन घर का बालक और किसी राजगृह की रमणी है। यह पुरुष भी दिव्यवपु लग रहा है। बात क्या है? क्या इसका पुण्यकाल समाप्त हो गया?
(सामने जा कर खड़े हो जाते हैं। राजा प्रणाम करता है।)

शिष्य: मेरे गुरुदेव! आपको गृहकार्य के लिए एक दास या दासी चाहिए। सम्पूर्ण दिवस यज्ञादि तथा शास्त्र-शिक्षण, शिष्योपदेश में ही बीत जाआ है। अतः गुरुपत्नी की संभाल एवं विप्रकुलोचित सुश्रुषा के लिए सेवक खरीदा जा सकता है।

ब्राह्मण: तुम यह कार्य कर क्या रहे हो और यह बताओ क्या कर सकते हो? कैसे रहोगे? क्या है तुम्हारा मोल?

राजा: क्यों कर रहा हूँ, नहीं बता सकता। हाँ इतना जान लें कि ब्राह्मण की दक्षिणा चुकानी है। कर क्या सकता हूँ, मैं क्या जानूँ! जो भी स्वामी का आदेश होगा, करूँगा। जहाँ भी, जैसे भी, जिस हालत में रखेंगे, रहूँगा। सब सहर्ष स्वीकार है। किसी भाँति द्विज ऋण तो मिटे।

ब्राह्मण: जल भरने, आसन, वस्त्र, कमरे साफ करने, बाहर झाड़ू लगाने, पुष्प चयन करने तथा अन्य वाह्य क्रिया-कलापों में सामान आदि लाने ले जाने का कार्य करना होगा। स्वीकार है?

राजा: हाँ श्रीमान! सब स्वीकार है।

ब्राह्मण: तुम्हारा दुर्दिन देखकर तुम्हें खरीद ले रहा हूँ, लेकिन ब्राह्मण का क्रोध उसकी नियम-निष्ठा को याद रखना। रंच भर भी क्षमा नहीं, और हाँ मैं पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ दूँगा। इससे अधिक नहीं। ये लो मुद्राएँ। जल्दी चलो। मेरे हवन का समय हो रहा है। अधिक उधेड़ बुन करनी हो तो जा आगे बढ़। हम चले।
(रानी दौड़कर पैर पकड़ती है।)

रानी: नहीं धरती के देवता! ऐसा न करें। मेरे प्राणनाथ संकट में हैं। मैं उनकी अर्द्धांगिनी किस काम आऊँगी। मुझे खरीद लें, मैं सब काम करूँगी। पर-पुरुष संभाषण एवं उच्छिष्ट भोजन छोड़कर आप जो कहेंगे, मैं सब करूँगी। मैं और मेरा नन्हा रोहित आपकी सेवा में वैसे ही लगे रहेंगे, जैसे काया के पीछे छाया ही लगी रहती है। (हाथ फैलाकर भीख माँगती हुई) हे परोपकारी देवता! आप हमें खरीद लें। मैं अपने आर्यपुत्र का म्लान मुख नहीं देख पा रही हूँ। देवता कृपा करें! (बिलखती है।)

रोहिताश्व: (माँ की भाषा में) हमको खरीद लें बाबा, बड़ी कृपा होगी।

ब्राह्मण: ठीक है। नर या नारी कोई भी हो, मेरा कार्य हो जाएगा। यह स्त्री मेरे बर्तन वस्त्र आदि धो लेगी, गृह मार्जनी कर लेगी और यह लड़का पूजा के पात्र धोएगा, फूल तोड़ ले आएगा, यज्ञ की लकड़ियाँ एवं उपले बटोरेगा। लो पति परायणे, ले लो स्वर्ण मुद्राएँ।
(रानी के हाथ पर रखता है। रानी वह सोना राजा के दुपट्टे में बाँध देती हैं। रोहित माँ का आँचल पकड़ कभी इनका, कभी उनका मुख देख रहा है।)

राजा: (उद्विग्न होकर) हाय रे विधाता! पहले जिसे राजरानी बनाकर रखा, आज उसी को नौकरानी बना रहा हूँ। क्या यह दिन भी देखना बाकी था! राजपुत्र को चाकरी करनी होगी। मैं क्यों जन्मा ही धरती पर। सत्य तुम्हारी जय हो, तुम्हारी जय हो।

रानी: आर्यपुत्र! आज्ञा दें कि मैं क्षण भर के लिए जी भरकर आपको देख लूँ, फिर तो इस मुख का दर्शन दुर्लभ हो जाएगा। कहाँ आप कहाँ मैं।
(पाँव छुकर बार-बार क्षमा याचना करती हैं। राजा उनका सिर सहला रहे हैं। आँखों में आँसू उमड़ आए हैं।)

ब्राह्मण: बन्द करो यह सब चरित्र। मैं चल रहा हूँ। शिष्य है, उसके साथ आ जाओ।
(ब्राह्मण जाता है। शिष्य बार बार चलने को कह रहा है, रोहित की बाँह पकड़ कर खींच रहा है। वह माँ से लिपट-लिपट जाता है।)

रानी: अब आज्ञा दें महाराज! अपनी कमलिनी को सूर्य दूर क्षितिज में रहकर भी तो जिलाए रखते हैं। (ऊपर की ओर दृष्टि करके, हाथ जोड़कर) ओ ब्रह्माण्ड को ज्योतित करने वाले ज्योतिपुंजों, ओ अनंत के धाराधर, ओ व्योम, ओ सोम, ओ सूर्य! मेरे आर्यपुत्र की सत्य की धरती के लिए अमृत दो! ओ देवगुरु, ओ वृहस्पति, ओ अमृत कवि, ओ भार्गव, ओ पावक, ओ मरुत! मेरे आर्यपुत्र की सत्य की धरती के लिए अमृत दो! ओ मरीचि लोकोद्गमों, ओ सप्तर्षि मण्डलों, ओ ऋक्, ओ साम, ओ यजुः! मेरे आर्यपुत्र की सत्य की धरती के लिए अमृत दो! ओ शिव, ओ महाकाल! आप अपने इन धर्मध्वजवाहक धरणीपति को सत्य की रक्षा के लिए अमृत दो, संजीवनी दो!
(इसी बीच पैर पटकते हुए क्रोध से आँखें लाल किए विश्वामित्र का प्रवेश।)

विश्वामित्र: ओ दानी, ला दे मेरी दक्षिणा! महीना भर बीत गया। सायंकाल होने को है। यहाँ कैसा नाटक फैलाया है तुमने!

हरिश्चन्द्र: महाराज! आधी स्वीकार कीजिए। शेष स्वयं को बेचकर अभी चुकता कर देता हूँ।

विश्वामित्र: आधी क्यूँ? सीधे कह दे, नहीं देना है। यह भी ले जा। ऐरा गैरा समझ रखा है क्या?

राजा: प्रभु अभी दिन शेष है। स्त्री-पुत्र को बेचकर आधा धन पाया, वह आपको समर्पित है। शेष स्वयं को बेचकर तुरंत दे दे रहे हैं। क्रोध शान्त हो, विप्र देवता!

विश्वामित्र: देख रे क्षत्रिय! मैं वही विश्वामित्र हूँ जिसके तपोबल से विधाता की सृष्टि काँपती है। तुम्हें अभी ब्राह्मण का ऋणी होने के कारण शाप नहीं दिया, इतना शुभ जानो। यदि आज की सायंकालीन आरती की बेला तक मेरी पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ नहीं दिया तो शाप देकर तुम्हारे सिर को खण्ड-खण्ड कर दूँगा। अभी जाता हूँ, फिर आऊँगा।

राजा: (शैव्या से) हे देवि! व्रत धारिणी प्रिये, जा! उपाध्याय की सेवा मन लगाकर करना। गुरु पत्नी को गुरु समान आदर देना। शिष्यों को पुत्र भाव में देखना। स्वधर्म और शील की रक्षा करना।

“समय की गति निराली है, प्रकृति का ढंग अपना। किसी का सत्य निर्मम है, किसी का नर्म सपना। कहेगा कौन पिक गाए न चातक यों न रोए। विजन वन का सुमन हूँ, मैं सुरभि अपनी सँजोए..।”

जाना तो है ही वल्लभे, जा!
(रानी जाती है। शिष्य बालक को घसीट कर ले जाता है। अंतरिक्ष से हाय, हाय की ध्वनि गूँजती है।)
अवर्णनीय कष्ट है इस धर्मधुरीण को। कितना हृदयहीन है विश्वामित्र!

राजा: (हाथ जोड़्कर) अरे सेठ साहूकारों! मुझे कोई पाँच सौ स्वर्ण मुद्राओं में खरीदकर मुझ पर कृपा कर देता। ब्राह्मण देवता का ऋण चुकाना है। ब्राह्मण के लिए मेरी गुहार सुन लो। मुझे खरीद लो। भईया मुझे खरीद लो। ब्राह्मण देवता आते ही होंगे। मैं झोली फैलाकर भीख माँग रहा हूँ, बड़ी कृपा होगी। हे दानशीलों! इस दीन पर दया करो, दया करो। अपनी सदाशयता का परिचय दो। अरे, कोई भी नहीं सुन रहा है। विश्वेश्वर की नगरी में भी मैं अनाथ हो गया। हाय रे विधाता!

(धर्म का प्रवेश)

धर्म: यह मेरे लिए इतना कष्ट सह रहा है। इस सत्य व्रती की कातरता तो देखते नहीं बनती। अब मैं आगे चलता हूँ। सत्य-पथ की इस यात्रा का न तो इसे पता है न मुझे। अंत तो इस यात्रा का है ही नहीं।

(धर्म चाण्डाल का वेष धारण करता है)

चाण्डाल: हाँ भैया! कहाँ बिकवइया है। खरीदवइया आ गया।

राजा: आप कौन हैं दयावान?

चाण्डाल: हम चंडाल, डोम के राजा। बसेरा मसान में है। नदी के दोनों तीर-यही इस डोम का डेरा है। यहीं मसान में सोता जागता हूँ। हर चिता को आग देता हूँ। हर मुर्दा से तन का कपड़ा माँगता हूँ, बिना आधा कफन दिए लाश नहीं जलती मेरे मसान पर। तो साफ-साफ सुनो, मसान पर रमना होगा, कफन खसौटी करना होगा। यदि मंजूर हो तो बताओ और यह रुपया ले गठियाओ!

राजा: (स्वयं से) बड़ा दारुण समय उपस्थित है। झुक जाओ मेरे सिर सत्य, धर्म की जिज्ञासा भरे प्रश्न के सामने! गिर जाओ हे ग्रन्थ, ज्ञान, विज्ञान, संस्कार, स्वभाव मेरे सिर पर के निरर्थक भार से तुम इस मिट्टी पर! हे प्रत्युत्तरहीन महाप्रश्न! जिसने तुम्हें उत्तीर्ण कर दिया, उस दिव्य धर्म की जय हो! (चाण्डाल से) हे दयालु पुरुष! यहाँ मैं हूँ, यह मैं हूँ। आपका क्रीतदास हुआ।

चाण्डाल: तो अब लोटा-सोंटा-पगरी-झोरी लेकर पयान करो। दक्खिनी मसान अब तुम्हारी जिम्मेदारी पर।
(राजा सिर झुकाकर स्वीकार कर रहा है। इसी बीच विश्वामित्र का आगमन।)

विश्वामित्र: क्यों रे! ला, दे मेरी दक्षिणा। नसों में संचरित  होने वाले आवेश का रुधिर-वेग अब तक रोके था। अब तेरे सर्वनाश का समय उपस्थित हो गया है। कालपुरुष को मैं अविराम उस दिशा में दौड़ते हुए देख रहा हूँ, जहाँ शान्ति तो होगी पर ऋषि-आश्रमों की नहीं श्मसान की।

राजा: ऋषिवर! पराक्रम उस पर शोभा देता है जो रण में हो, न कि उसपर जो शरण में हो। मैं आपके पाँव पकड़ता हूँ। आप क्रोध को शांत करें, ये रहीं पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ। अपनी दक्षिणा स्वीकार करें। अब मैं उऋण हुआ।

विश्वामित्र: (विश्वामित्र साश्चर्य मुद्रा ग्रहण करते हुए, स्वगत) इस परीक्षा में यह अभी तक स्वयं को संभाले रहा, लेकिन मैं भी विश्वामित्र हूँ, मजा चखा दूँगा। इसको अपने सत् पथ से गिराना ही होगा। मैंने देवराज इन्द्र के सामने चुनौती स्वीकार की है। (चले जाते हैं)

चाण्डाल: हर मुर्दे के पीछे घूम-घूम कर कपड़े ले लेना होगा, और सुबह शाम मटके से भर कर पानी भी घर में रखना होगा।

राजा: जो आज्ञा।

सबै दिन होत न एक समा्न।
एक दिन राजा हरिश्चन्द्र सम्पत मेरु समान।
एक दिन भरत डोम घर पानी, अम्बर हरत मसान।
सबै दिन होत न एक समान॥

पाँचवा दृश्य - ( ब्राह्मण की कुटिया का दृश्य। कुटी में रानी शैव्या झाड़ू लगा रही हैं। रोहिताश्व पीछे से आकर रानी की आँख बन्द कर देता है। )

रानी: देख बेटे! अश्रु नदियों और पीड़ा पर्वतों की मैं राजरानी हूँ। अभी तुमने पीछे से आकर अपने कोमल हाथों से मेरी आँखें बन्द कर दीं; तुम्हारी अँगुलियों ने सुस्पष्ट भाषा में मुझे बताया, “सृष्टि में विकलता को देखने की अपेक्षा अंधता ही बेहतर है।” अब अपने लाल का मृदुल तन छाती से लगाया तो मुझे लगाया तो मुझे लगा, लालने दुलारने योग्य है दुनिया की हर चीज। केवल यही मृदल कोमल हाथ सुदृढ़ कर सकता है मंगलसूत्र की गाँठ को। बेटे आगे आ जा। बैठ यहाँ।

रोहित: माँ! पिताजी को बुला लो। कहाँ हैं, कहाँ हैं? हमारा जी जिस किसी भी भाँति उन तक पहुँच जाने के लिए बेचैन हो रहा है।

(रोने लगता है)

रानी: वे कहाँ हैं यही तो जिज्ञासा है। रो मत लाल। बार-बार चू पड़ने वाले तुम्हारी आँख के ये मोती मूल्यवान हैं हजारों सिक्कों से। सम्भव है तू आगे बढ़कर संसार की सजल आँखे पोछने की चेष्टा करोगे। तुम्हें आलिंगन में ले मैं उन्हें पा लेती हूँ।

रोहित: आज माँ, मुझे कलेवा करा देना अपने हाथ का। कब गुरु जी तत्काल तुम्हें कहाँ और मुझे कहाँ भेज दें, पता नहीं। तब तक पूरे प्रकाश की उपस्थिति होने के पहले ही दौड़कर मैं फूल तोड़ लेता हूँ।

( डलिया लिए फूल तोड़ने के लिए अंधेरी फुलवारी की ओर लपकता है। रानी उसकी ओर मौन देखती रह जाती है। फिर बर्तन धोने लगती है। तभी धड़ाम से गिरने का शब्द झाड़ी के बीच सुनायी देता है। रानी उठ कर जाती है। )

रानी: दौड़ो रे, बचाओ! मेरी आँख के आगे ही एक विशालकाय काला नाग घूमते हुए जा रहा है। उसने ही रोहित को डँस लिया है। आवाज भी नहीं निकली। शरीर काला हो गया है। मुँह से फेन बह रहा है। मेरी आँखों के सामने ही फूल की डलिया उलटी पड़ी है।

(इसी बीच रोहित की अंतिम हिचकी आती है। उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। रानी चीत्कार करती हुई गिर पड़ती है। ब्राह्मण कुछ शिष्यों के साथ दौड़कर आते हैं।)

ब्राह्मण: अरे, यह तो मर गया। मेरी फूलबगिया में मृत शरीर! मंडप अशुद्ध हो गया। लेकर भाग इसे श्मसान घाट। आज तो पर्व का दिन है। किसी को साथ लगा भी नहीं सकता। जा, चली जा। जा, बहती गंगा में इसे फेंक देना। कल सायंकाल तक अंतिम क्रिया करके चली आना। आगे समय नहीं दूँगा। ठीक से सुन लो! मरना-जीना तो लगा ही रहता है। कितने मरते हैं  मरघट पहुँच कर अपनी आँखों देख लेना। मृत काया अधिक समय तक नहीं रखी जाती। वह प्रेताविष्ट हो जाती है। तुम इसे उठा ले ताकि स्थान धुलवाया जा सके।

रानी: यह चक्रवर्ती सम्राट का बेटा है विप्रवर! इसका शरीर यहाँ वसन विहीन मृत होकर पड़ा है। कम से कम प्राणशून्य इस अबोध बालक का शरीर ढ़्कने के लिए वस्त्र की व्यवस्था तो कर देते। मैं माँ हूँ। आप मेरे और मेरे इस कलेजे के टुकड़े-दोनों के बाप हैं।

(छाती पीट-पीट कर रोती है। कभी रोहित का मुँह चूमती है तो कभी उपाध्याय से गिड़गिड़ाती है।)

ब्राह्मण: मैं आज व्रतनिष्ठ हूँ। ईश्वर-चर्चा के अतिरिक्त और कुछ नहीं सुनना है मुझे। भागती है या….(क्रोधित होते हैं)

रानी: हे अन्तरिक्ष के साक्षी देवों! आज यह तेरी नृप वधू अपने चक्रवर्ती पुत्र को लेकर श्मसान भूमि जा रही है; यह कितना श्रुतिसम्मत है इसका प्रमाण कौन देगा!

(आधा आँचल फाड़कर पुत्र को ढँकती है। अकेले रोहित को उठाये श्मसान की ओर चल देती है।)

छठाँ दृश्य - ( श्मसान का भयानक वातावरण। मरघट भूमि में चिताएँ जल रही हैं।
राजा सतर्क दृष्टि से प्रत्येक नवागत शव को खोज-खोजकर कफन इकट्ठा कर रहे हैं। इस कोने से उस कोने तक घूम रहे राजा की गंभीर मनःस्थिति है। )

राजा: हाय रे संसार की नश्वरता। यह सद्यःपरिणीता वधू का शव है। चिता पर आधा जला, क्षत-विक्षत झूलता हुआ। सिन्दूर रेखा अग्नि शिखा में विलीन हो गयी है। परिजन छोड़कर चले गए हैं। कौन साथी है, अब कौन बाँह पकड़ेगा? अब संगी धर्म होगा। (आगे बढ़कर) अरे, यहाँ तो  पुत्र का शवदाह हुआ है। इसे छाती से लगाकर कैवल्य का सुख लूट रही थी भाग्यवती माँ। इसका मुख माँ की छाती पर अमृत लेप कर रहा था। सब सपना हो गया। (आगे बढ़कर) अरे, ये श्रृंगाल, श्वान शवों को नोंच रहे हैं, हड्डियों और खोपड़ियों को लात मारते हुए कापालिक अघोरी नंगे नाच रहे हैं। सुरा पात्र बनी है खोपड़ियाँ औघड़ों के लिए। हड्डियों की वीणा पर भैरव राग चल रहा है।
क्वचित वीणावाद्यं क्वचिदपि च हाहेति सदनं ।
न जाने जगतोयं किममृतयम् वा विषमयम् ॥
मेरी पीड़ा को मेरा विक्षिप्त हृदय दुहरा रहा है। जब मैं दृष्टि गड़ाकर देखता हुँ तो यह विश्वलुप्त हो जाता है। फूँक मारकर फुलाता हूँ तो मनुष्यता फूट जाती है। हारी हुई बुद्धि घोषणा करती है कि जीवन व्यर्थ का अध्ययन है, बेगार है।

(हरिश्चन्द्र दण्ड लिए श्मसान की हर छोर नाप रहे हैं, जोर जोर से बोलते हुए चेतावनी देते जा रहे हैं….)

राजा: अरे लोगों सुनो! मेरे मरघट के राजा की आज्ञा है कि बिना कफन का आधा वस्त्र कर में चुकाए कोई भी शव को नहीं जलाएगा। मेरे अधिकार में यह श्मसान घाट है। बिना कर दिए मुर्दा जलाने वाले को दण्ड दिया जाएगा। सुनॊं मुर्दा लाने वालों! बिना कफन का कर दिए मुर्दा नहीं जलाना है….सुनो, सुनो! खबरदार!
(रोहित को दोनों हाथों से छाती में चिपकाए शैव्या प्रवेश करती है। श्मसान के एक कोने में शव
भूमि पर रखकर करुण विलाप कर रही है।)

रानी: हाय रे मेरे लाल! मेरे सुगना, तू कहाँ उड़ गया। अब किसे कलेजे लगाकर जिऊँगी। किसके मुख को देखकर निहाल बनूँगी। जाग बेटे, देख तेरी मैया कलेवा लेकर बैठी है। एक बार तो उसके हाथ से कलेवा कर ले। कब से पुकार रही है तेरी माँ! कौन मेरी आँख बन्द करेगा! कौन माला की तरह गले में झूल जाएगा! बेटा, एक बार तो आँख खोल दे! तेरा विहँसता हुआ मुख देखकर अपने प्राणनाथ के वियोग का सब दुख हँस-हँस झेल गयी! मेरे आँखों की पुतरी! तुम एक बेर तो बोल दे मेरे लाल! सब विद्यार्थी आ गए हैं, पूजा की बेला बीत रही है। उपाध्याय बुला रहे हैं, उठ जा रे बेटा!

राजा: (चौकन्ना होकर) अरे इस नारी का विलाप सुनकर तो कलेजा मुँह को आ जा रहा है। क्या बात है कि मन खिंचा चला जा रहा है। आवाज कुछ पहचानी सी लग रही है। जगत की कोलाहलपूर्ण नीरवता में कोई दिव्यात्मा पंचतत्वों के बंधन काटकर मृत्यु का वरण कर रही है। यह कौन सा मधुर स्पर्श है, जो मुझे छू रहा है।

रानी: हाय! हाय! जीवन नीरस स्थाणु हो गया है। वात्सल्य का उद्दाम ज्वार उतर गया है। हाय रे काल निर्मोही, तूने मिट्टी की कुँवारी सुगन्ध छीन ली। घर की एकमात्र टिमटिमाती लौ को फूँक मार बुझा दिया। अब कौन रूठेगा, कौन मचलेगा अपनी मैया के आगे! उठ जा लाल, मुझे घर की गैल बता दे बेटे! मन को मगन कर देने वाले रोहित, क्या माँ से नहीं बोलोगे?

राजा: अरे रोहित! इस नाम ने तो अनाम पीड़ा पैदा कर दी। किसी नई जलने वाली चिता की ओर चलूँ। मेरे रोहित के नयन, वयन, हलन-चलन, आकुल आलिंगन, विदा की बेला का आश्वासन, आह्वाहन-सब मेरी आँखों के आगे नाच गया। बेटे की दुग्ध-धारा सी निर्मल मुस्कान….। ओ! यह कौन माता है जो रो रोकर मरी जा रही है। अपने धड़कते, कसकते, मचलते जीवन की धरती पर आँसू की माला बरसा रही है।

रानी: नक्षत्रों, अपने लोक का पथ अवलोकित करो! आज पृथ्वी का महापुत्र यात्रा कर रहा है। ओह आकाश! अपने उद्यान के मधुर उज्ज्वल पुष्पों को इस महाअतिथि की यात्रा के पथ पर विसर्जित करो। अरे ओ बरसाती मेघमयी रजनी! इस अबोध बालक पर जिसने अपनी ही नहीं संसार की आँखों का उजाला खो दिया है, उस पर करुणा करो। मेरे बेटे! हो सकता है मेरा शरीर अभी मिट्टी में विलीन हो जाय, किन्तु तब भी तुम में जीवित रहेगी मेरे जीवन की सार-सत्ता…। रोहित में शैव्या, शैव्या में रोहित। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती ऐसे जीवन की, जिसमें चिड़िया का गाना नहीं, झुरमुट की हरीतिमा नहीं, पवन में नए धान्यों की महक नहीं, मकरन्द की मधुरिमा नहीं और स्वशिशु का शीतल स्पर्श नहीं। मैं मरकर भी सतृष्ण याद करती रहूँगी तुम्हारे मन्द स्व की आभा जो जीवन की सारसत्ता को आवाहित करती है।

राजा: अरे, ये करुण स्वर मुझे ढकेल क्यों रहा है उन दिनों की ओर, जो बीत गए हैं कब के। मेरे मुन्ने, तुम क्यों घेर लेते हो मेरा मन अपने प्यार के जाल की चहारदीवारी बाँधकर। हटा लो जरा मेरे दैनिक कार्यों में बाधा डालने वाले अपने हाथों को। अभी पहुँचा मैं इस नये आए शव के पास।
(बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली चमकती है।)

रानी: (हाथ जोड़े ऊपर देखती है) मेरे प्राणनाथ! तुम कहाँ हो? काश आ जाते और एक बार जिसे अपनी गोद में खिलाया है उस लाडले का मुँह देख लेते। “प्यारे जू है जग की यह रीति विदा के समय सब कंठ लगावें।” अब क्या मेरे लिए उचित है कि अपने समय को बरबाद करूँ। मेरी श्वासों के झूले, अब मत झूलो आगे पीछे। तुम आ जाते प्राणेश, सिर्फ आज के लिए, सिर्फ आज के लिए। (कुछ थमकर) आ रहे हैं प्रियतम, अब समीप प्रतिध्वनित हो रही है उनकी पदचाप। उनका संगीत मेरी अन्तरात्मा में गूँज रहा है। लो विश्वामित्र! राजा हरिश्चन्द्र गए, पुत्र रोहिताश्व गया। अब रानी शैव्या गंगा की गोद में लोटेगी। आपका कलेजा अब तो ठंडा हो जाना चाहिए। हरिश्चन्द्र का नाम लेकर निखिल मानवता मृत्युंजय हो जाएगी। अरे ओ मेरे अश्रु! अगाध हृदय समुद्र के अनमोल द्युतिमय मोती, रुको, रुको। तुम्हारा मूल्य आँकने वाला रस पारखी वाम विधाता ने बनाया ही नहीं। मुझे प्रियतम को ढूँढ़ लेने दो। तब फिर बहना, खूब बहना। (रोहित को देखकर) आ मेरे लाल, एक बार फिर तुम्हें भर अंक भेंट लूँ। काष्ट चिता में दूध पिलाने वाले हाथों से आग की लपट बिखेर दूँ। तू भी जल मैं भी जलूँ। अयोध्या की प्रजा, क्षमा करना! सत्य के देवता, क्षमा करना! प्रियतम के सिन्दूर से सजी माँग में पुत्र की जली राख पोतकर अखण्ड पुत्रवती बने रहने का वरदान श्मसान देव से माँग लूँगी। फिर तुम्हें दहकता देख तेरी जलन को अपने कलेजे में धारण कर, गंगा में कूद जाऊँगी (चिता में आग लगाने जा रही है।)

राजा: खबरदार! खबरदार! बिना कफन दिए आग नहीं लगाना (वहाँ पहुँच जाते हैं) शव का वस्त्र उतारकर आधा दे दो देवि! तब क्रिया करो। यह मेरे राजा का हुक्म है। (हाथ फैलाते हैं)

रानी: आँचल फाड़कर लपेटा है इस शव को। चक्रवर्ती राजा हरिश्चन्द्र का पुत्र सर्पदंश से मृत हो गया है। इसे वस्त्र भी मुहाल नहीं हुआ। मैं भी अर्द्धनग्न, पुत्र भी अर्द्धनग्न। एक चिता को छोड़ देते तो कृपा होती।

(बिजली चमकती जा रही है।)
(रानी राजा को और राजा रानी को पहचान लेते हैं, फिर भी धर्म की दुहाई देते हैं।)

राजा: देवि! सत्य की विजय होती है। इसमें ही सत् चित् आनन्द की त्रिवेणी लहराती है। सनातन जीवन का यही धुव केन्द्र है। तुम्हें भी सत्यमेव जयत के ध्वज को आकाश तक लहराना ही है। छोड़ दो यह विलाप-कलाप। समय की गति निराली है। हम गुलाम हैं। कहीं रहें गुलाम का धर्म निबाहना है। यह समय बड़ा खिलवाड़ी है। आगे और पीछे सब में जो चिरन्तन सत्य है, हमें, तुम्हें उस मर्यादा से डिगना नहीं है। तुम अपना धर्म पालो, हम अपना धर्म।

रानी: प्रिय! मेरे सबकुछ, तुम यहाँ हो, मैं तुम्हीं को खोज रही थी। अब कैसा धर्म, कैसी मर्यादा? तुम्हीं मेरे सब कुछ हो। लीजिए अपना कर। (आँचल फाड़ने जा रही है, राजा लेने को हाथ बढ़ा रहे हैं।)

(तब तक पृथ्वी काँपने लगती है, गंगा की धारा रुक जाती है। धन्य-धन्य की ध्वनि के साथ नेपथ्य में बाजे बजने लगते हैं। त्रिदेव, धर्म, सत्य आदि प्रकट होकर राजा हरिश्चन्द्र की जयकार करने लगते हैं।)

धर्म: बस्! बस्! बहुत हो गया, बहुत हो गया। अब त्रैलोक्य को सँभालो अन्यथा महाप्रलय हो जाएगी। मैं ही चाण्डाल बनकर श्मसान में तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।

सत्य: राजा हरिश्चन्द्र की जय हो! मैं ही ब्राह्मण वेशधारी उपाध्याय बना था, जहाँ शैव्या और रोहिताश्व को शरण मिली थी।
(विश्वामित्र का प्रवेश)

विश्वामित्र: आओ राजन! (गले लगा लेते हैं) ऐसी सत्य-निष्ठा न हुई और न होगी। तुम्हारी परीक्षा भी ले रहा था, तुम्हें सँभाले भी था। सोना अग्नि तप्त होकर ही तो दीप्त होता है। विजयी भवः।
(हरिश्चन्द्र और शैव्या सभी ऋषि तथा देवों को प्रणाम करते हैं।)

मैंने ही तक्षक को डँसने के लिए भेजा। (जल लेकर रोहित के ऊपर छिड़कते हैं) रोहित, उठ जाओ बेटा!
(रोहित उठकर सबको प्रणाम करता है।)

शिव: काशी नगरी हरिश्चन्द्र के आगमन से गरिमामय हुई। तुम धन्य हो! (पुष्पवर्षा होती है।)

नारायण: हे धर्म, सत्य, सदाचरण के प्रतिमूर्ति! तुम्हारी कीर्ति यावत् चन्द्रदिवाकर अक्षय रहेगी। रथ तैयार है। अयोध्या का राज सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। चलो!(विश्वामित्र हाथ पकड़कर सबको रथ में बैठाते हैं, पुष्प वर्षा होती है, सूत्र-वाक्य गूँजता है)

सत्यमेव जयते। सत्यमेव जयते। सत्यमेव जयते।